पद्मश्री पाने वाले पहले ब्लाइंड क्रिकेटर हैं : शेखर नाइक

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शेखर नाइक असल जिंदगी का भी नायक बनना चाहता था। पर दृष्टिहीनता उसके राह की सबसे बड़ी रुकावट थी। वह इसे अपना सबसे बड़ा अभिशाप मानते थे पर अब वही उनके लिए सबसे बड़ा वरदान बन गया। जी हां, हम बात कर रहे हैं पद्म श्री के लिए नामांकित होने वाले पहले दृष्टिहीन क्रिकेटर शेखर नाइक की। कर्नाटक के एक छोटे से जिले शिमोगा के नाइक रहते हैं बचपन में अपनी दृष्टिहीनता को अपनी सबसे बड़ी कमजोरी मानते थे, खुद पर गुस्सा आता था और खुद पर गर्व होता है। इनकी दृष्टिहीनता ही इनके लिए वरदान बन गई। बल्ले और गेंद ने इनकी जिंदगी बदल दी। भले ही आंखों की रोशनी कम है, लेकिन क्रिकेट ने अंधेरी जिंदगी में रोशनी बिखेर दी है। भारतीय ब्लाइंड टीम के पूर्व कप्तान शेखर को टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली के साथ पद्मश्री अवार्ड से नवाजा जाएगा। शेखर कहते हैं इससे बड़ा सम्मान मेरे लिए और क्या हो सकता है। मैंने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मुङो यह प्रतिष्ठित सम्मान मिलेगा, वह भी विराट के साथ। मेरे पास अपनी खुशी बयां करने के लिए शब्द नहीं हैं। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका और पाकिस्तान के क्रिकेट बोर्ड पहले ही ब्लाइंड क्रिकेट को मान्यता दे चुके हैं। दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड को भी अब इसमें देर नहीं करनी चाहिए। शेखर नाइक ने सरकार से भी अपील की कि वह अन्य खिलाड़ियों की तरह ब्लाइंड क्रिकेटरों को भी सभी सुविधाएं देने के साथ ही नौकरी भी दें। शेखर बचपन से ही आंखों की रोशनी से वंचित थे। यह उनके परिवार की आनुवांशिक बीमारी थी। शेखर की मां और नानी भी दृष्टिहीन थीं। उनके परिवार के 15 लोग दृष्टिहीन हैं। आठ साल की उम्र में एक दिन अचानक शेखर नदी में गिर गए। इस हादसे ने उसकी जिंदगी को एक नया मोड़ दिया। इसी समय शिमोगा में आंखों का एक कैंप लगा था। जांच से पता लगा कि शेखर की आंखों की रोशनी वापस आ सकती है। इलाज के लिए उन्हें बेंगलुरु लाया गया और एक ऑपरेशन के बाद शेखर नाइक की दायीं आंख की रोशनी 60 प्रतिशत तक लौट आई। शेखर के बचपन में उनके पिता का देहांत हो गया था। मां ने 11 साल की उम्र में एक ब्लाइंड स्कूल में दाखिला दिला दिया। इसी दौरान उन्होंने क्रिकेट खेलना शुरू किया। अपने स्कूल के लिए शेखर ने स्टेट लेवल टूर्नामेंट खेला। मां उनका हौसला बढ़ाती थीं। जब वह 12 वर्ष के थे, उनकी मां का भी देहांत हो गया। छुट्टियों में खेत में काम करके अपनी फीस भरते थे।

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