भूल सुधार- सुशांत सुप्रिय

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भूल-सुधार

एक बहुत पुरानी संदूक में से  unnamed
निकली थीं मेरे बचपन की
कुछ किताबें-कापियाँ
जिन्हें विस्मित हो कर
देख रही थीं
मेरी अधेड़ आँखें

कि अचानक
अपनी बनाई किसी
बहुत पुरानी पेंटिंग पर
अटक गई मेरी निगाहें

वहाँ बीच सड़क पर कड़ी धूप में
मौजूद थे बरसों के थके कुछ लोग

उनकी बोलती आँखों से
मिली मेरी आँखें
और स्तब्ध रह गया मैं —
‘ तुम्हारी बनाई इस पेंटिंग में
कहीं कोई छायादार पेड़ नहीं
बरसों से इस भीषण गरमी में
झुलस रहे हैं हम … ‘

अक्षम्य भूल —
सोचा मैंने

तभी मेरी सात बरस की पोती ने आकर
बना दिए उस पेंटिंग में
कुछ छायादार पेड़
कुछ रंग-बिरंगी चिड़ियाँ

इस तरह
बरसों बाद कुछ थके राहगीरों को
छायादार ठौर मिल गई

 

सुशांत सुप्रिय

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