हर कदम हर घड़ी यूँ ही छलते छलते रहे -दुर्गेश अवस्थी

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लोग        चेहरे पे चेहरे     बदलते रहे

स्वाभिमानी भरी  जिंदगी में हमें
ठोकरें तो लगीं पर सम्हलते  रहे

मोम होकर भी कुछ लोग पत्थर बनें
हम तो पत्थर भी होकर पिघलते रहे

जिंदगी मौत का खेल चलता रहा
और हम तो खड़े हाथ   मलते रहे

हमको हर पात्र निज रूप देता गया
और हम है कि पानी से  ढलते रहे

इक क्षितिज पर मिलन के लिए आज तक
आसमां और धरती मचलते रहे

जिनकी पलकों में छिपकर मैं बैठा रहा
वो ही तिनका समझकर मसलते रहे

Kavi Durgesh Awasthi
Geetkar / Ghazhalkar

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