आरक्षण बचाने के लिए उदित राज की रैली में दिल्ली में शामिल हुए लाखों लोग

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नई दिल्ली, 26 दिसम्बर 2017, अनुसूचित जाति/जनजाति/पिछड़ा के संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ के
राष्ट्रीय अध्यqक्ष डॉ. उदित राज के नेतृत्व में दिल्ली के रामलीला मैदान में आरक्षण बचाओ महा रैली का आयोजन किया
गया | रैली में देश के विभिन्न राज्यों दिल्ली, उत्तर-प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, केरल,कर्नाटक, तमिलनाडु, पंजाब,
झारखण्ड, उड़ीसा, बिहार और राजस्थान आदि से दलितों/आदिवासियों और पिछड़ों सहित लाखों की संख्या में लोगों
ने भाग लिया |
परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदित राज ने रैली को संबोधित करते हुए कहा कि लगातार निजीकरण की आंड में
आरक्षण को समाप्त किये जाने के प्रयास किया जा रहा है | पिछड़े और दलित हजारों वर्षों से शोषित और वंचित रहे हैं
| आज हम आज़ाद भारत में रह रहे हैं लेकिन इन वर्गों के ज़िन्दगी में विशेष परिवर्तन नहीं हो सका है | यह दुर्भाग्य है
कि भारत में सामाजिक स्तर पर ही नहीं बल्कि आर्थिक क्षेत्र में भी सर्वाधिक असमानता है | जो अमीर हैं वह अमीर
होते जा रहे हैं और बहुमत में लोग या तो बेरोजगार हैं या ठेके पर कम से कम वेतन पर काम कर रहे हैं | सरकारी
विभाग में रेस लगी है कि रोजगार एवं काम को ठेका पर दे दिया जाये या आउटसोर्स कर दें | इसका सबसे ज्यादा
प्रतिकूल असर दलित/आदिवासी और पिछड़ों पर पड़ा है | कोई भी जनतांत्रिक सरकार हो यह मान कर चला जाता है
उसका चरित्र कल्याणकारी होगा और प्राथमिकता सबसे ज्यादा अपने नागरिको को रोजगार देने की है |
डॉ. उदित राज ने विशाल रैली में बोलते हुए कहा कि आरक्षण को विकास का अवरोध माना जाता है जबकि यह
गलत है | मद्रास में आरक्षण 1921 में, मैसूर और त्रिवान्कोर में 1935 और कोल्हापुर रियासत में 1902 में लागू हुआ
और ये राज्य उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में विकास के कई सूचकांक में आगे हैं | अब समय आ गया है कि
तथाकथित सवर्ण भाई और बहन विचार करें कि हम भी उन्ही के समाज का हिस्सा हैं जैसे अश्वेतों के साथ अमेरिका में
गोरों ने किया | इनकी विभिन्न क्षेत्रों में भागेदारी से देश प्रगति करेगा | यह कभी नहीं संभव है कि लगभग 20 प्रतिशत
आबादी की खरीद शक्ति के बल पर उत्पादन और मांग को बढाया जा सकता है | इन लोगों को आरक्षण दिया जाता है
तो आय बढ़ेगी और क्रय शक्ति | जब वस्तु और सेवा की मांग बढ़ेगी तब कुल घरेलु सकल में उछाल आएगा और
व्यापारियों को भी फायदे होंगे | जो मेरिट की मिथ्या है कि आरक्षण से निकम्मापन का जन्म होता है वह गलत है |
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. अश्वनी देश पाण्डेय ने अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर एक शोध किया
किआरक्षण से सरकार में क्या असर पड़ता है तो पाया कि प्रतिकूल तो कतई नहीं लेकिन जहाँ दलित/ आदिवासी
कर्मचारी ज्यादा थे वहां उत्पादकता में इजाफा ही हुआ है | इस परिपेक्ष में यह बिलकुल उचित है कि निजी क्षेत्र में
आरक्षण दिया जाए | डॉ. उदित राज ने संसद में निजी क्षेत्र में आरक्षण के लिए प्राइवेट मेम्बर बिल पेश किया है और
सरकार से अनुरोध है कि उसे सरकारी बिल में परिवर्तित करके कानून बनाया जाये ताकि निजी क्षेत्र में आरक्षण दिया
जा सके |

निजीकरण के शुरूआत से अजा/जजा वर्ग के लोग शासन-प्रशासन से ही नहीं, परन्तु आर्थिक और शिक्षण क्षेत्र में भी
वंचित हो रहे हैं। इस वंचित होने का एक अहम कारण देश की न्याय प्रणाली है। बेरहमी से विधायिका द्वारा प्रदान किए
गए अधिकारों को न्यायपालिका छीन लेती है। उदाहरण के तौर पर 81वां, 82वां एवं 85वां संवैधानिक संशोधन
वाजपेयी सरकार लायी थी। 85वां संवैधानिक संशोधन पदोन्नति में आरक्षण के लिए किया गया था, जिसे उच्चतम
न्यायालय में चुनौती दी गयी और 2006 में इसका निर्णय आया जो नागराज केस के नाम से जाना जाता हैं। पांच जजों
की पीठ ने इस संवैधानिक संशोधन को वैध माना था लेकिन इसमें कुछ अनुचित शर्तें भी लगा दी थी, जैसे – पर्याप्त
प्रतिनिधित्व की जांच, पिछड़ापन और प्रशासनिक दक्षता पर असर न पड़ता हो। जहां तक पिछड़ेपन का सवाल है, यह
तभी साबित हो जाता है,जब अजा/जजा वर्ग के लोगों को संविधान की धारा 341 और 342 के तहत लाया जाता है,
जिसका परीक्षण भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग एवं राष्ट्रीय
अनुसूचित जन जाति आयोग द्वारा किया जाता है। भारत सरकार में लगभग 150 सचिव हैं जिसमे 2-4 ही दलित और
पिछड़े समाज से होंगे तो प्रतिनिधित्व की बाहुल्यता क्या भारी कमी है | दिसम्बर 2012 में राज्यसभा में पदोन्नति में
आरक्षण देने के लिए बिल पास हुआ लेकिन लोकसभा में असफल रहा | आज की रैली में प्रस्ताव पास किया गया कि
सरकार इसी सत्र में बिल लाकर के पास करे ताकि पदोन्नति में आरक्षण की सारी अडचने दूर की जा सके |
ठेकेदारी प्रथा की वजह से मजदूरों का शोषण बेइंतहा होता है | अध्यापक,कर्मचारी,चपरासी और मजदूर कोई भी हो
| निजी क्षेत्र में नगदी द्वारा वेतन और मजदूरी दी जाती है | जो कागज में तो पूरा दिखाया जाता है परन्तु वेतन का
भुगतान आधा-अधूरा ही किया जाता है | ऐसे में सरकार द्वारा चेक या डिजिटल भुगतान से शोषण रुकेगा और इसका
सर्वाधिक लाभ दलित आदिवासियों को मिलेगा |
परिसंघ की प्रमुख मांगे :-
1. पदोन्नति व निजी क्षेत्र में आरक्षण
2. सरकारी नौकरी में ठेकेदारी प्रथा एवं आउटसोर्सिंग बंद किया जाये
3. अनुसूचित जाति योजना एवं जन जाति उप योजना कानून बनाओ
4. आरक्षण कानून बनाओ
5. सेना और उच्च न्यायपालिका में आरक्षण |
6. बैकलॉग पदों को भरने हेतु विशेष भर्ती अभियान
7. समान शिक्षा एवं भूमिहीनों को भूमि
8. एक राज्य का जाति प्रमाण-पत्र सभी राज्यों में मान्य हो
9. महंगाई की दर से छात्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी
10. .राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन और उसमें आरक्षण
11. जम्मू व कश्मीर में धारा 370 हटाया जाए और आरक्षण लागू हो
12. दिल्ली में 20 सूत्रीय कार्यक्रम में आबंटित भूमि का मालिकाना हक
13. बैंक की प्रत्येक शाखा दलित/ आदिवासी को लोन दें ताकि स्टैंड अप इंडिया सफल हो |
14. प्रक्युर्मेंट पालिसी को सही मायने में लागू किया जाये |
15. एससी/एसटी हब को लागू किया जाये |
16. रेहड़ी पटरी वालों को कारोबार के लिए जगह दी जाये |

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