अंत नहीं है शुरुआत

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rashmi chawla

 

फूलवारी है जीवन, निराशा क्यों बोता है ।
हंस के तो देख, जीवन क्या नहीं देता है ।।

होते न यदि भाई विरुद्ध ।
तो न होता महाभारत का युद्ध ।।
बढ़ता कैसे फिर अच्छाई का मान ।
सम्भव न था, फिर भगवत गीता का गान ।।
हर एक तार जब दूसरे से जुड़ता है ।
क्रम सृष्टि का तभी बढ़ता है ।।
फूलवारी है जीवन, निराशा क्यों बोता है ।
हंस के तो देख, जीवन क्या नहीं देता है ।।

 

था वो भी मनुष्य सज्जन ।
पूर्ण किया था, जिसने अपना वचन ।।
जिससे की पूर्ण अपनी कुंठा की आस ।
दिया इक माँ ने पुत्र को वनवास ।।
लगा तब उनकी गृहस्थी पर भी ग्रहण ।
हुआ जब, मईया का अपहरण ।।
स्मरण हुई विसराई, मारुती जी को शक्ति ।
हुआ अंत, मिली तब रावण को मुक्ति ।।
हर पल दूसरे पल का गवाह बनता है ।
परीक्षाओं के भँवर में ही, जीवन चलता है ।।
फूलवारी है जीवन, निराशा क्यों बोता है ।
हंस के तो देख, जीवन क्या नहीं देता है ।।

 

जब हुआ एक पिता को घमंड ।
आया पुत्र, लेकर भक्ति का ओज प्रचंड ।।
था बालक जो सांसारिकता से निर्मोह ।
किया पिता ने, उसका विद्रोह ।।

समाप्त करने विनाशकारी अहंकार ।
हुआ नरसिंह का, तब अवतार ।।

समझानी, बस इतनी सी है बात ।
अंत नही, नए क्रम की, है शुरुआत ।।
हे नर! दुखी क्यों, मन को करता है ।
ठहर जा, सब कुछ अच्छे के लिए होता है ।।
जब वो भी हर पीड़ा सहता है ।
फिर तू क्यों संघर्षो से डरता है ।।
फूलवारी है जीवन, निराशा क्यों बोता है ।
हंस के तो देख, जीवन क्या नहीं देता है ।।

रश्मि चावला
लेखिका

 स्नातकोत्तर बी.एड

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