अन्तर्राष्ट्रीय माँ दिवस पर विशेष…

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हिंदीफिल्मों में माँ पर कुछ यादगार गीतोंके बोल…….

माँ जीवन का सार है माँ हैतो संसार।

माँ बिना‘लाल’जीवन समझों हैं बेकार।।

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लालबिहारी लाल

हिंदी फिल्मों में मां की थीमपर फिल्माए गए सभी गीत फिल्ममें माँ का एक दमदार किरदार के आसपास रहे हैं। माँ एकशब्द है जिसमें श्रृष्टि के समस्त जीवो की उत्पति होती है .इसलिए माँ की महिमाअद्वितीय है।अपवादों को छोड़ दिया जाए,तो शुरू से ही कई सामाजिकहिंदी फिल्मों में मां की एक संस्कारी,पारंपरिक,और: मातृत्व कीशक्ति और विश्वास से मजबूतछवि देखने को मिलतीहै।

हिंदी फिल्मी गीत में माँ कीछवि की शुरुआत चौथे दशक की है- हिंदी फिल्मों में मां की पहली स्पष्ट छवि उभरतीहै। यह छवि पारंपरिक है। जन्म देने वाली मां की छवि,जिसके प्रति गीतों में एककृतज्ञता का भाव है। इस दौर की वे फिल्में,जिनमें मां को ध्यान में रखकरगीत-संगीत संजोया गया है,इस तरह हैं :’प्रेम सागर’ (1939) ‘मां ने हमको जन्म दिया,’मेरा हक’ (1939) ‘मां की ममता मां की ममता,ना जगत में दूजी समता…”दीपक’ (1940) ‘माता की है यह अभिलाषा,मुन्ना बोले माता-माता…’,’प्यार’ (1940) ‘मां लाल-लाल पुकारे,खाली झूलना कैसे झुलाऊं’।इन गीतों में मां का ममतामयी रूप सामने आता है। जाहिर है,एक चरित्र के रूप में मां कोफिल्मों में अहमियत मिलने लगी थी और ये गीत उस अहमियत की ही गवाही हैं। इस तरहशुरू हुई गीतों की लयकारी में मां की यह आरंभिक छवि आगे के दशकों में दूर तक जातीहै। कहीं-कहीं तो मां की भूमिका जिंदगी का ही पर्याय बन जाती है। मिसाल के तौर परबॉम्बे टॉकीज के बैनर तले बनी फिल्म’जन्मभूमि’ (1936)में सरस्वती देवी द्वारा नर्सरीराइम शैली में गाया गया गीत’माता ने है जन्म दिया जीने के लिए,नहीं रो-रो कर मरने के लिए’।

पांचवेंऔर छठे दशक के फिल्मी गीत में मां को प्रतीकात्मक ढंग से ईश्वर के रूप में पेशकरते हैं। मां की मूरत और मातृपूजा कई तरह से मुमकिन हुई है।’घर की नुमाइश’ (1949) ‘माता के प्यार में बसी हैप्यार की दुनिया’,’धूमधाम’ (1949) ‘मां अब कौन सुने,कौन सुने गम की कहानी’,’दौपदी’ (1944) ‘मां किसने दिया बुझाया”अंधों का सहारा’ (1948) ‘मां तू ही मेरा सहारा,कैसे मिले किनारा’,’छमिया’ (1945) ‘मां-मां तुम बिन कौन सहाई’,’अब दिल्ली दूर नहीं (1957) ‘माता ओ माता,जो तू आंख होती,मुझे यूं बिलखता अगर देखती’ये तमामगीत कभी सीधे-सीधे,तो कभी प्रतीकों में मां की छवि को ईश्वरीयबनाने के साथ-साथ पहले से चली आ रही मां की’जननी’वाली छवि को ही आगे ले जातेहैं।यह कहना गलत न होगा कि जिस तरह कई दशक तक हिंदी फिल्में बेहद भावुक रहीं,उनके गाने,और खासतौर से मां से संबंधितगाने,भी कुछ उसी ढर्रे पर रहे।चित्रगुप्त के संगीत में, ‘खुश रहे तेरी नगरी बेटा,मां ये दुआ कर चली’ (‘घर बसाकर देखो’- 1962)और मदन मोहन के संगीत से सजाऔर मोहम्मद रफी का गाया गीत, ‘मां है मुहब्बत का नाम’ (‘मां का आंचल’- 1970)सरीखे कई उदाहरण आगे के बरसोंसे भी दिए जा सकते हैं। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीतबद्ध’राजा और रंक’ (1968)का निरूपा राय और महेश कोठारेपर फिल्माया’तू कितनी अच्छी है,तू कितनी भोली है,प्यारी-प्यारी है,ओ मां’और’छोटा भाई’ (1966)फिल्म में नूतन और महेशकोठारे पर फिल्माया गया गीत’मां मुझे अपने आंचल में छुपा ले,गले से लगा ले’जैसे लता मंगेशकर के गाए गीतबहुत खूबसूरत हैं,लेकिन अंतत: ये भी भावुकता यामातृपूजा से ऊपर नहीं उठ सके हैं।

इसके उलट कहीं अधिक प्रभावी और यथार्थपरक है साहिर लुधयानवी का लिखा औरजयदेव के संगीत से सजा फिल्म’मुझे जीने दो’ (1963)का गीत’तेरे बचपन को जवानी की दुआंदेती हूं,और दुआं दे के परेशान सी होजाती हूँ’। इस कड़ी में मजरूहसुल्तानपुरी का लिखा और रोशन के संगीत से सजा फिल्म’दादी मां’ (1966)में राग यमन कल्याण आधारितगीत’उसको नहीं देखा हमने कभी,पर इसकी जरूरत क्या होगी,ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवानकी सूरत क्या होगी’ (मन्ना डे,महेन्द्र कपूर) और बंगाल कीजात्रा लोक शैली पर आधारित फिल्म’मंझली दीदी’ (1967)का हेमंत कुमार द्वारासंगीतबद्ध’मां ही गंगा,मां ही जमुना,मां ही तीरथधाम’ (लता मंगेशकर) को भी शामिलकिया जाना चाहिए।

आठवें दशक औरइसके बाद की फिल्मों में भी मां पर आधारित कई गीत आते रहे हैं। मिसाल के लिए वसंतदेसाई द्वारा संगीतबद्ध’रानी और लालपरी’ (1975)का गीत’मां के आंसू,मां की ममता,मां जाने रे’ (आशा भांसले की आवाज),कनु राय द्वारा’आविष्कार’ (1973)के लिए रचित’मेरे लाल तुम तो हमेशा थेमेरे मन की अभिलाषा में’ (मन्ना डे की आवाज),लक्ष्मी प्यारे के संगीत मेंफिल्म’मां’ (1978)का’मां तुझे ढूंढूं कहां (रफी कीआवाज) सरीखे गीत बड़े गायकों द्वारा गाने के बावजूद लोकप्रिय नहीं हो सके। नब्बेके दशक की फिल्मों में’लाडला’का गाना’तेरी उंगली पकड़ के चला,ममता के आंचल में पला’,फिल्म’बेटा’का गाना’आज मेरी मां ने मुझको बेटा कहके बुलाया है’और फिल्म’वास्ता’का अजित वर्मन द्वारा भटियालीकी अद्भुत प्रयोगात्मक संरचना के साथ’मां बोलो कब तलक यूं ही जलना है’जैसे गाने भी ज्यादा लोकप्रियनहीं हो सके। इसकी बड़ी वजह यह रही कि इन गानों में मां की पारंपरिक छवि से अलगकुछ नया गढ़ने का जतन नहीं किया गया था।

आज भीआदुनिकता की दौड में माँ पर हिंदी फिल्मों में गीत लिखने का सिलसिला जारी है।’मां’की थीम पर हिंदी फिल्म संगीतके दो सबसे खूबसूरत गीत हाल की फिल्मों के ही हैं।’तारे जमीं पर’का शंकर महादेवन की आवाज औरसंगीत से सजा गीत’मैं कभी बतलाता नहीं,पर अंधेरे से डरता हूँ मैंमां’और’दसविदानिया’का कैलाश खेर का लिखा औरउन्हीं की आवाज में गाया गया’मां,मेरी मां,प्यारी मां,मम्मा’के न सिर्फ बोल और धुन लाजवाबहैं,बल्कि यह गीत मां को नैतिकताके संस्कारी सिंहासन से उतार कर उसे एक आम इंसान की स्वाभाविकता और आत्मीयताप्रदान करते हैं। माँ अपनी सारी कमजोरियों और अच्छाइयों के साथ आज के जीवन केसंदर्भों के बीच भी चट्टान की तरह खड़ी है।

सचिव-लाल कला मंंच,नई दिल्ली

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