अनुभव

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हर रोज़ सोचती हूँ कुछ तो  लिख दूँ ,मन मे जो बोझ है उसे पन्नों पे रख दूँ, पर सोचती हूँ क्या और लिख बैठती हूँ क्या ।

जो वेदनाएँ डुबोती हैं
हर रोज़ मुझे उन्हें उतार दूँ शब्दों मे ,

जो देते हैं सभी मुझे वो प्रत्येक अनुभव
उन्हें सजा दूँ कागज़ पे ,
पर बह जाती है वो समय के साथ,
जगह लेती है कोई और ही बात ।

कोई निशानी तो रह जाए ,
समय को बांध लूँ स्याही से,
पर कुछ भी सार्थक नहीं हो पाता

हर भावना मे अधूरापन लिए
आगे बढ़ जाती हूँ

जीवन की किताब मे,
लिखना हैं बहुत कुछ अभी

यही सोचकर

क्योंकि पन्ने बहुत है खली पड़े….

*सविता सिंह दास*

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