यही है मोदी के आर्थिक सुधारों का प्रयोजन 

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विश्व बैंक ने भारत में विदेशी व्यापार की संभावनाओं को नई ऊर्जा दे दी है। इससे आशा की जाती है कि आने वाले समय में भारत में देसी एवं विदेशी निवेश की बाढ़ आएगी, क्योंकि दूसरे देशों की तुलना में भारत में व्यापार करना आसान हो गया है। विश्व बैंक ने व्यापार में सुगमता की वैश्विक रैंकिंग में भारत को 130 वें स्थान से उठाकर 100 वें स्थान पर स्थापित किया है। निश्चित ही यह देश के लिये आर्थिक एवं व्यापारिक दृष्टि से एक शुभ सूचना है, एक नयी रोशनी है एवं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आर्थिक एवं व्यापारिक प्रयोगों एवं नीतियों की दिशा में सफलता का एक प्रमाण-पत्र है, जिससे लिये वे, उनकी पार्टी या समूचा देश उत्सव मनाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है।
भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में सबसे अहम भूमिका उसके बढ़ते मार्केट की हो सकती है। इस दृष्टि से भारत का 30 पायदान ऊपर सरकना भारत में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करेगा। दूसरे देशों की तुलना में भारत में व्यापार करना अब आसान हो गया है। इससे भारत को लेकर दुनिया में नई उम्मीद जगी है। संभावना है कि इन स्थितियों के कारण भारत का व्यापार भी विदेशों में बढ़ेगा।
भारत की रैंकिंग ने ऐसे समय उछाल मारा है जब देश में नोटबंदी एवं जीएसटी को लेकर नरेन्द्र मोदी को अनेक विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। नोटबंदी और जीएसटी से लगे घावों को भरने के लिये हर दिन प्रयत्न किये जा रहे है। मोदी घोर विरोध एवं नोटबंदी एवं जीएसटी के घावों को गहराई से महसूस कर रहे हंै, तभी उन्होंने हाल में सार्वजनिक रूप से जीएसटी परिषद की 10 नवंबर की बैठक में व्यापारियों को ज्यादा से ज्यादा राहत दिये जाने की घोषणा की है। इन नये आर्थिक सुधारों, कालेधन एवं भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिये मोदी ने जो भी नयी आर्थिक व्यवस्थाएं लागू की है, उसके लिये उन्होंने सर्वसम्मति बनायी, सबकी सलाह से फैसले हुए हैं तो अकेले मोदी पर रोष क्यों हैं? अकेली भाजपा को बदनाम क्यों किया जा रहा हैं? लेकिन यह भी यथार्थ है कि भले ही सर्वसम्मति बनी हो, लेकिन निर्णय लेने में कुछ जल्दबाजी हुई है, कुछ पूर्व तैयारी में कमी रही है, इसलिये आखिरी जिम्मेदारी तो जेटली और मोदी की ही है, जिन्होंने आगा-पीछा सोचे बिना नोटबंदी और जीएसटी की अंधेरी गलियों में न केवल आम आदमी को झोंका, बल्कि भारत के व्यापार, अर्थव्यवस्था एवं विदेशी निवेश को खतरे में डाला। कुछ भी हो ऐसे निर्णय साहस से ही लिये जाते हैं और इस साहस के लिये मोदी की प्रशंसा हुई है और हो रही है। संभव है अभी नहीं लेकिन कुछ समय बाद इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आयेंगे। किसी गहरे घाव को जड़ से नष्ट करने के लिये कड़वी दवा जरूरी होती है। अब कालेधन एवं भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये नोटबंदी और जीएसटी भले ही कष्टदायक कदम सिद्ध हो रहे हैं, उन्हें वापस भी नहीं लिया जा सकता लेकिन मोदी ने जो रास्त पकड़ा है, वह सही है, आर्थिक अराजकता एवं अनियमिता को समाप्त को समाप्त करने का रास्ता है  और लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल है।
नरेन्द्र मोदी का आर्थिक दृष्टिकोण एवं नीतियां एक व्यापक परिवर्तन की आहट है। उनकी विदेश यात्राएं एवं भारत में उनके नये-नये प्रयोग एवं निर्णय नये भारत को निर्मित कर रहे हैं,  विश्व बैंक ने भी इन स्थितियों को महसूस किया है, मोदी की संकल्प शक्ति को पहचाना है, तभी एक साथ 30 पोइंट का उछाल देकर नयी संभावनाओं को उजागर किया है। मोदी का सीना ठोक-ठोककर अपनी आर्थिक नीतियों के बारे में अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना अनुचित नहीं है। भले ही राजनीति के दिग्गज एवं जानकर लोग इसे मोदी का अहंकार कहे, या उनकी हठधर्मिता लेकिन मोदी ने इन स्थितियों को झुठला दिया है। वे देश को जिन दिशाओं की ओर अग्रसर कर रहे हैं, उससे राजनीति एवं व्यवस्था में व्यापक सुधार देखा जा रहा है। धनबल एवं बाहुबल को काफी हद तक हाशिया मिला है। पर बुद्धिबल, जो सबमें श्रेष्ठ एवं ताकतवर गिना जाता है, उस पर नियंत्रण बिना राष्ट्रीय चरित्र बने संभव नहीं। क्योंकि अन्ततोगत्वा बुद्धिबल ही राज करता है। वहां शुद्धि के बिना लोकतंत्र की शुद्धि की कल्पना अधूरी है।
निश्चित रूप से मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण शेयर मार्केट से लेकर कमोटिडी मार्केट तक विदेशी कंपनियों को बेहतर रिटर्न भारत से ही मिल रहा है। यही कारण है कि वे इसे काफी तवज्जो दे रही है। उनका तो हाल यह है कि नीतियों को अनुमति मिलने से पहले ही वे निवेश के लिये तैयार हैं। मल्टी ब्रैंड रिटेल में एफडीआई की बात चली तो वॉलमार्ट, टेस्को वगैरह ने भारतीय रिटेल सेक्टर में निवेश के लिये उत्साह दिखाया है, सामने आये हैं। इधर अनिवासी भारतीयों ने भी निवेश बढ़ाना शुरू कर दिया है। ये भारत की अर्थ-व्यवस्था के लिये शुभ संकेेत हैं।
भारतीय वस्तुओं की साख और मांग विदेशी बाजारों में बढ़ती जा रही है। भारत ने नए बाजार तलाश लिए हैं और इनमें भारतीय सामानों को सराहा जा रहा है। निर्यात बढ़ता गया तो भारत का व्यापार घाटा कम हो सकता है। ऐसा हुआ तो विदेशी मुद्रा भंडार के बारे में भारत को चिंता करने की जरूरत नहीं होगी। ऐसा भी नहीं है कि आर्थिक सेक्टर में सब अच्छा ही अच्छा है। यहां सबसे बड़ी चुनौती है आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की, ताकि निवेश का रास्ता खुले, मार्केट में होड़ बढ़े। इसमें सबसे बड़ी बाधा है चुनौतियों का राजनीतिकरण। चाहे वह जीएसटी को लागू करने का प्रश्न हो। जन-जन को आर्थिक सुधारों की मुख्यधारा में शामिल किया जाना जरूरी है। ऐसा सिस्टम बनाने और लागू करने में कुछ दिक्कतें जरूर हैं, मगर इसकी शुरूआत मार्केट को नई एनर्जी दे सकती है।
विश्व बैंक ने भारत को रैंकिग देते हुए क्या दृष्टिकोण अपनाया, यह महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन जिन आधार पर इस तरह की रैंकिंग मिलती है, हमें अपने वे आधार मजबूत करने चाहिए। जिनमें कर्ज लेने की सुगम व्यवस्था, कर अदा करने की सरल प्रक्रिया, बैंकों की ऋण देने की इच्छाशक्ति, उद्योग चालू करने की प्रक्रिया, नये व्यापारियों के लिये कम-से-कम कानूनी व्यवधान एवं व्यापार सुगम बनाने के कदम आदि पर हमें गंभीरता से आगे बढ़ना चाहिए। यह जगजाहिर है कि विश्व बैंक पर अमेरिकी सरकार का दबदबा है। अमेरिकी सरकार पर अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व है। इन कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना सुगम हो गया है, इसलिए विश्व बैंक ने भारत सरकार को 30 पोइंट का इजाफा करके यह प्रमाण पत्र दिया है। भले ही किन्हीं पूर्वाग्रहों के कारण भारत की रैंकिंग में सुधार आया है, लेकिन निश्चित ही इससे अमेरिका के अलावा अन्य देशों को भारत में व्यापार में सुगमता रहेगी और यह स्थिति भारत को आर्थिक एवं व्यापारिक दृष्टि से एक नया मुकाम देगी। इसके लिये भारत सरकार को जमीनी स्तर पर व्यापार सुगम बनाने के कदम उठाने चाहिए। छोटे उद्योगों के दर्द को दूर करने की जरूरत है। नये व्यापारिक उद्यमों को प्रोत्साहन दे, स्टार्टअप केवल कागजों में न होकर जमीन पर आकार ले, मेंकिग इंडिया कोरा उद्घोष न रहे बल्कि दुनिया में इसका परचम फहराये। बहुत सारे लोग जितनी मेहनत से नर्क में जीते हैं, उससे आधे में वे स्वर्ग में जी सकते हैं, यही मोदी का आर्थिक दर्शन है और यही मोदी के आर्थिक सुधारों का प्रयोजन है।
(ललित गर्ग)

 

 

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