पुस्तक परिचय:अस्मितामूलक साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र

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पुस्तक परिचय:अस्मितामूलक साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र-
संपादक -कर्मानंद आर्य,द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन,इग्नू रोड,दिल्ली-110068,
प्रथम संस्करण-2018,मूल्य-450रुपया।
संपर्क-9968527911/8130284314
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अनुक्रम की दृष्टि से पुस्तक पाँच खण्ड में यथा-सौंदर्यशास्त्र के बदलते प्रतिमान के अंतर्गत चार आलोचनात्मक लेख-सौंदर्यशास्त्र की कसौटी,विमर्शों का कलापक्ष,आदिवासी सौंदर्यबोध और साहित्य ,हिंदी -साहित्य में अस्मिता-बोध।

दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र शीर्षक के अंतर्गत आठ आलेख है ,दलित जाति,दलित अस्मिता,अस्मितामूलक आत्मकथाओं का वितान,डॉ.अंबेडकर विचारधारा और दलित महिला लेखन,दलित चेतना,दलित साहित्य की अस्मिता का प्रश्न,अस्मितामूलक साहित्य का अंबेडकरवादी सौंदर्यशास्त्र आदि।

आदिवासी साहित्य का सौंदर्यशास्त्र शीर्षक के अंतर्गत आठ आलेख है-आदिवासी साहित्य की पृष्ठभूमि,स.जन की दुश्वारियां,संघर्ष एवं सौंदर्य,समकालीन आदिवासी हिंदी कविता का सौंदर्यशास्त्र,अस्मिता-बोध:जागरण एवं संघर्ष,जीवन- संघर्ष एवं परिवर्तन की चुनौतियाँ,आदि।

स्त्री साहित्य का सौंदर्यशास्त्र शीर्षक के अंतर्गत 6 आलेख है -स्त्री प्रश्न और प्रतिबद्धता का सवाल,अवधी लोकगीतों में अस्मिता के प्रश्न,हिन्दी महिला कथा लेखन में नारी अस्मिता की पड़ताल,वर्तमान हिंदी कहानियों में स्त्री की सामाजिक अस्मिता,हिन्दी कविता में आदिवासी स्त्रियों के सवाल और संघर्ष-चेतना,मगही संस्कार -गीतों में झाँकता स्त्री का सच।

अन्य विमर्श शीर्षक के अंतर्गत भी 6 आलेख है-यथा-पसमांदा मुस्लिम अस्मिता एवं साम्प्रदायिकता के प्रश्न,अस्मितामूलक साहित्य का सौंदर्यशास्त्र,अस्मितामूलक साहित्य का ‘मैं और उसका स्वरुप,वृद्ध-अस्मिता(रेहन पर रग्घू)ट्रांसजेंडर की जीवन यात्रा,ए हिजड़ा लाईफ स्टोरी के संदर्भ में आदि।

‘अस्मितामूलक साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र ‘नाम  ही पुस्तक पढ़ने  के लिए मन बेचैंन नज़र आता  है।सौन्दर्य इन्द्रियबोध की अनुभूति है।सौन्दर्य साहित्य और जीवन का नित्य और जीवंत तत्व है।सौन्दर्य के प्रतिमान भी बदलते रहते हैं।जिसके कारण शाश्वत सौंदर्यशास्त्र नहीं रहता।कारण  यह सामाजिक संरचना पर निर्भर है।अतः सौन्दर्य का प्रतिमान भी काले लोगों का गोरे लोगों के सौंदर्य के प्रतिमान सा नहीं हो सकता ,ठीक वैसे ही खाए-पीए अघाये लोगों के प्रतिमान भूखे,नगें,दूखे लोगों के प्रतिमान कभी नहीं होंगे। हिन्दी में विमर्शों  ने एक अलग सौंदर्यशास्त्र का माग करता है।किसान विमर्श,थर्ड जेंडर विमर्श,बालविमर्श,स्त्री,पसमांदा मुस्लिम अस्मिता, विमर्श,वृद्धविमर्श,पुरुषविमर्श,इकोफेमिनिज्म आदि ने सौन्दर्य का प्रतिमान बदला है।

“अस्मिता शब्द का अर्थ’अपने होने का भाव,अहंभाव,हस्ती,हैसियत,अपनी सत्ता की पहचान,अहंकार,अस्तित्व,विद्यमानता,मौजूदगी है।हिन्दी साहित्य में पहली बार अज्ञेय द्वारा आइडेन्टिटी(Identity) के लिए हिन्दी शब्द अस्मिता का प्रयोग हुआ है।1950 के आसपास नामवर सिंह ने भारतेंदु के शब्दों में’स्वत्व निज ही भारत है’यह स्वत्व वहीं है जिसे आजकल  अस्मिता कहते हैं,को स्वीकार किया है।पर गहन विचार-विमर्श करने पर हम पाते हैं कि भारतेंदु और नामवर जी का विचार जो अस्मिता के संदर्भ में हैं वह भाषाई अस्मिता के संदर्भ में है।इसको अस्मिता के विराट फलक के साथ मिलाकर नहीं देख सकते हैं।अस्मिता की राजनीति और पूँजीवाद में गर्भनाल का संबंध है।भारतेंदु का नवजागरण सामुदायिक अस्मिता है,वह निजी पहचान या अस्मिता नहीं है।सही मायने में अस्मिता का सवाल आधुनिक युग की देन है।”(पृष्ठ-54)
सौन्दर्यशास्त्र की बहुत सी परम्पराएँ है-भारतीय,पाश्चात्य,वैकल्पिक,दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र,मार्क्सवादी,आदिवासी साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र,स्त्री साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र,अस्मितामूलक साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र
,साम्प्रदायिकता का सौंदर्यशास्त्र।
“हिन्दी का पारंपरिक ‘स्त्री साहित्य ‘जहाँ सामंतवाद,पितृसत्ता,जातिवाद,क्षेत्रवाद से कुंठित रहा है वहीं उसमें भाषायी अस्मिता,जेंडर का सवाल,वर्चस्व की राजनीति और घृणा का पोषण आदि स्त्री को रीड्यूश करता है।हिन्दी पट्टी में स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता रहा है।”(पृष्ठ-9)

अस्मितामूलक साहित्य को समझने के लिए पहले समाज और समाज में व्याप्त वर्णवाद को समझने की जरुरत है।समाज का कल्याण वर्णवाद से नही वर्ग से होता है।यह वर्गवाद में सम्पन्न वर्ग और विपन्न वर्ग का अध्ययन जरुरी है।कारण सम्पन्न वर्ग का सौन्दर्य प्रतिमान,विपन्न वर्ग का सौन्दर्य प्रतिमान नहीं हो सकता।
“अस्मितामूलक साहित्य वह है,जिसमें वंचितों,दमितों,दलितों,सर्वहारा वर्ग की संवेदनाओं को प्रमुखता प्रदान करते हुए उसी वर्ग को नायकत्व प्रदान किया गया हो,जैसे दलित,स्त्री,आदिवासी,थर्ड जेंडर।अस्मितामूलक साहित्य वह है,जिसमें इन वर्गों का नेतृत्व हो और वह नेतृत्व उनकी संवेदना को प्रस्तुत करते हुए उत्कर्ष प्रदान करता हो।अनुभूत या भोगा गया यथार्थ उनके संघर्ष की प्रस्तुति में प्रधान भूमिका का निर्वहन करता है।”(पृष्ठ-291)

पुस्तक सौंदर्यशास्त्र एवं अस्मिता पर पुनःविमर्श ,संवाद,करने का अवसर प्रदान करता है ।

डॉ.कर्मानंद आर्य एवं प्रकाशक दोनों को बधाई ।
【डॉ.रणजीत कुमार सिन्हा】

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