बहुत दिया-छगन लाल गर्ग

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बहुत दिया मेरे खजांची   16003038_383339378683707_2780913876179097482_n
तुच्छ पात्र मेरा
समाता नही दिव्य दिया
लौकिक लघुता लहर लिपटा
पदार्थ परख परिपक्व घना
अंधेरा आँखो सरकता रहा
ओर भीगता रहा तृष्णा  औंस
मिट्टी मजबूत करता रहा
ताप देकर जिन्दगी की
घनीभूत सुखों की लहरें उन्नत
छलावा भरती अनंत का
भ्रमित जीवन खोता रहा
बेहोशी भरी मदहोशी में
आँधी हटी उजास आच्छादित
भोगा अंधेरा कलंक बना
आज जीवन दाग अंकित
आत्म हीनता लज्जित मनोबल
आह अनुपम दान तेरा
मानव मन मनीष महान महात्म्य
ज्ञान विज्ञान गतिमान चेतन
अंशमय प्रकाश पुञ्ज तेरा
कर कर्म कारण परिणाम मात्र
नही पा सका अतुलनीय सार तेरा
बहुत भराव  ज्ञात विश्वास तेरा
अभाव अकथनीय स्वाद केवल
रही कमी केवल अभिव्यक्ति की
यही जीवन तेरी कंजूसी मात्र ।

छगन लाल गर्ग

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