शिखर पुरुष बाल कवि बैरागी

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  दोस्तो, दिनांक मई 13, 2018 को जब मुझे प्रसिद्ध राष्ट्रकवि, लेखक एवं गीतकार बाल कवि बैरागी जी के निधन की दुखद सूचना मिली तो मेरी आँखों से अश्रु धार बह निकली और यह जानकर ह्रदय को अत्याधिक पीड़ा हुई कि एक बेहतरीन कवि एवं गीतकार आज हँसते गाते हमारे बीच से अनायास ही ये दुनिया छोड़कर चला गया।मेरी आँखों के सामने उनके साथ बिताये पल अचानक  फिर से जीवंत हो गए जब मध्य प्रदेश के मनासा गाँव में दादू प्रजापति के पुस्तक विमोचन और कवि सम्मेलन के कार्यक्रम में मेरा उस महान कवि एवं साहित्यकार से एक ही मंच पर मिलना हुआ।वह उस भव्य कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे और यह मेरा सौभाग्य था कि मैं भी कार्यक्रम में विशेष अतिथि और कवि एवं लेखक के तौर पर आमंत्रित था।उस कार्यक्रम में उनकी मधुर कविता और व्यक्तव्य से बहुत कुछ सीखने को मिला और आज भी उनकी वाणी मेरे कानों में गूँज रही है।आज फिर से मुझे ऐसा महसूस हुआ कि वो मेरे पास ही बैठे मुझसे बातें कर रहे हैं और सहसा मुझे अपनी लिखी कविता की ये पंक्तियां याद आ गई
        ये कैसा प्यारा, अद्धभुत सा एहसास है,
        तूँ भले है दूर मुझसे पर मेरे आसपास है।
  मिलते हैं, बिछुड़ते हैं दुनिया के कारवाँ में सब,
  पर रहना अमर दिल में सबके इक सुखद एहसास है।
      जनकवि और फक्कड़ मिजाज के बालकवि बैरागी जी का जन्म 10 फरवरी 1931 को मंदसौर जिले की मनासा तहसील के रामपुर गांव में हुआ था।बचपन से ही उनको कवितायेँ लिखने का शौक और चौथी क्लास में ही उन्होंने अपनी प्रथम कविता लिख डाली थी जो व्यक्ति को रोज व्यायाम करने की सीख देती है। बाल कवि बैरागी जी का जीवन अत्यन्त कष्टों और अभाव में बीता।बचपन से ही घोर गरीबी का सामना किया जिसके चलते बचपन से ही विकलांग पिता, माँ और बहिन के लालन पोषण के लिये गलियों में मांग मांग कर अपना और परिवार का पेट भरना पड़ा।उनके अनुसार उन्होंने 23 वर्ष की आयु तक कभी भी भरपेट खाना नहीं खाया था।परंतु वो काफी धैर्यवान और स्वाभिमानी स्वभाव के थे जिसके चलते उन्होंने इन बुरे दिनों का साहस से मुकाबला किया और अपने लेखन के साथ साथ राजनितिक सफर में भी ऊँचाइयाँ प्राप्त की।
     बालकवि बैरागी जी प्रसिद्ध कवि, गीतकार एवं लेखक होने के साथ साथ एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थे।मध्य प्रदेश विधान सभा से दो बार मंत्री पद पर भी रहे और राजीव गांधी जी के समय वो 1984 एवं 1989 में लोक सभा के सदस्य भी रहे।उन्हें राज्य सभा के लिए भी चुना गया।उन्होंने स्वयं एक पुस्तक भी लिखी जिसका शीर्षक था “मंगत से मिनिस्टर तक”। साहित्य जगत में उनका विशेष योगदान है और यह कहना अतिशियोक्ति ना होगी की उन्होंने अपना पूरा जीवन हिन्दी साहित्य को समर्पित कर दिया।उनकी प्रमुख कवितायेँ “सूर्य उवाच”, “हैं करोडों सूर्य, एवं “दीपनिष्ठा को जगाओ”हैं। इसके अतिरिक्त “झड़ गए पात बिसर गई टहनी” भी इनकी लिखी प्रसिद्ध कविता है।इन्होंने कुल 24 फ़िल्मी गीत भी लिखे हैं और रेशमा और शेरा जैसी प्रसिद्ध फिल्मों के गीत लिखकर एक नया मुकाम हासिल किया।फिल्म रेशमा और शेरा का 12 दोहों वाला गीत “तूँ चंदा मैं चांदनी” जिसे देश की प्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर जी ने गाया है बेहद प्रसिद्ध हुआ।
      कहते हैं कि हर इक व्यक्ति को भगवान ने साँसे गिन कर दी हैं और उसकी आज्ञा के बिना कोई एक भी सांस अधिक नहीं ले सकता।मौत का समय आते ही साँसे एकदम लुप्त हो जाती हैं इसलिये मैंने अपने लिखे गीत में भी कहा है जिसकी पंक्तियाँ हैं
 “मौत तो रवानी है बहता पानी है,
 जिंदगी के फ़लसफ़े की आखिरी कहानी है,
 एक दिन आनी है नहीं टाली जानी है,
 खुदा की ये कड़वी अटल पर वाणी है।”
    ये बात मई 13 को फिर से सिद्ध हुई जब अचानक दोपहर को एक कार्यक्रम से हँसते, गाते घर लौटे बाल कवि बैरागी जी को अनायास ही काल ने हमसे छीन लिया।आराम करने के लिये सोये बैरागी जी हमेशा के लिये चिर निंद्रा में सो गए।साहित्य जगत के ऐसे महान बुद्धिजीवी, गीतकार, साहित्यकार, कवि एवं लेखक को मैं नमन करता हूँ।आज भले ही बाल कवि बैरागी जी हमारे बीच नहीं है पर उनकी कवितायेँ हमें सदा प्रेरणा देती रहेंगी।
                    —आपका मित्र नरेश मलिक

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