बर्फीला तूफान

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शाम ढलने लगी थी और निशांत अभी तक दफ्तर से वापस नहीं आया ।शीला ने चिन्तातुर अपने बंगले के झरोखे से झाँका तो देखा बर्फ की फाँहे जमीन पर बिखर रही थी और निशांत… बर्फ भी  सफेद चादर की तरह पूरी जमीन पर फैल गयी बर्फीली हवा तेज गति होने के कारण बंगले के झरोखे से टकरा रही थी और बाहर हवा सांय –सांय बहती हुई पूरे पहाड़ी इलाके को अपनी चपेट में लिए हुई थी। तेज हवा होने के  कारण  फोन भी काम नहीं कर रहा था रात धीरे धीरे  गहराने लगी थी “अब शीला की  चिन्ता बढ़ने लगी। “शीला निशांत को खोजने निकल पड़ती है वह ” बर्फीली तूफान” की थोड़ा- भी परवाह नहीं करती उसके पाँव! पाँच-पाँच फीट बर्फ में धँसती जा रही थी शीला के हाथ पाँव बिल्कुल शून्य से हो गए “गाल लाल होकर” खुरदुरे हो  गए ठंड से बुरा हाल था। लेकिन शीला निर्भीक” होकर आगे बढ़ रही थी आखिर शीला निशांत के दफ्तर पहुँच जाती है लेकिन वहाँ निशांत को न पाकर शीला की हालत और भी बुरी हो जाती है | दफ्तर का चपरासी रामलाल शीला को देखता है और आकार पूछता है। मैडम आप यहाँ ? “हाँ रामलाल आज साहब दफ्तर से घर नहीं आए! तुम्हें मालूमreceived_1387258678062010 है? नहीं मैडम साहब को मैनें लंच समय में सिगरेट पीते बाहर देखा था उनके पास कुछ लोग थे वे सभी आपस में बात  कर रहे थे उधर से एक गाड़ी आयी और वे लोग साहब को गाड़ी में बिठा कर ले गए। मैं समझा साहब के दोस्त होगें। शीला रामलाल की बात सुनकर हतप्रभ थी कुछ समझ नहीं पा  रही थी कि क्या करें! शीला रामलाल को साथ  लेकर पुलिस स्टेशन जाती है और वहाँ निशांत के बारे में बताती है लेकिन उस समय पुलिस शीला की मदद नहीं कर पाता क्योंकि बर्फाली तूफान अभी भी जारी थी। पुलीस ने शीला को रात में थाना में ही ठहरने की सलाह दी शीला किसी तरह रात बिता! दूसरे दिन घर वापस आयी तूफान भी अब थम चुका था। शीला  निशांत को ढूंढने में दिन – रात एक कर दी पुलिस भी काफी मदद की लेकिन निशांत का कहीं भी पता न चला अब शीला की उम्मीद भी खत्म होने  लगी थी धीरे धीरे शीला अपने आप में खोने लगी | न बात करती, न खाना खाती बस गुमसुम एक जगह घंटों बैठी रहती। शीला के आँसू भी सूख गए थे बस! वह अब बेजान जिन्दगी जिने को मजबूर थी हर वक्त निशांत की याद में खोयी रहती कभी कभी होंठों पर हल्की मुस्कान दिख जाती थी शायद निशांत के उस पल को याद कर रही थी (शीला खो जाती है) शीला जल्दी करो पिक्चर छूट जायगी आज हमलोग बाहर ही खायेंगे। “हाँ”आती हूँ शीला साड़ी के पल्लू को सभाँलती हुई निकलती है।निशांत अपनी गाड़ी स्टार्ट करता है और निकल पड़ता है ।शीला बहुत खुश थी| निशांत थोड़ा मजाकिया  था वह शीला से मजाकिये  लहजे में बोला शीला “यदि मैं इन बर्फीली  पहाड़ियों में स़मा जाऊँ तो मुझे यही दफन कर देना कितना अच्छा लगता है यह “बर्फीली चादर”। है न? शीला निशांत के होंठ पर अपनी हथेली रखते हुए नहीं निशांत इस तरह की बात अब कभी मत करना बहुत घबराहट होती है। निशांत ठहाका लगाते हुए अच्छा बाबा अब कभी नहीं करूँगा ऐसी बात इतने में घंटी बजती है शीला चौंक जाती है बाहर का दरवाजा खोला  तो सामने मेहरी थी।शीला निशांत को भूल नहीं पाती। उस घर में एक मेहरी ही थी जो कभी कभार शीला उससे अपनी मन की बात कह लेती थी और मन शांत हो जाता था। जिन्दगी यू ही बितती गयी शीला निशांत की याद में शरीर को इतना ज्वलन्त बना लिया था जैसे चिता में सती हो गयी हो! वह बंगला भी अब काट खाने को दौड़ता था बंगले के हर कोने से उसे निशांत की आवाज सुनाई देती थी लेकिन जब तक वह निशांत के पास पहुंचती वह आवाज भी गायब हो जाती थी और शीला फिर उदास चेहरा लिए बैठ जाती थी न जाने क्यों उसे हर वक्त निशांत की आवाज सुनाई पड़ती रहती थी  या शीला का भ्रम। कुछ समझ नहींआ रहा था।

(कुछ साल बाद)
एक दिन शीला अपने काॅरिडाॅर में रखी अलमारी की सफाई कर रही थी.कि इसी क्रम  में एक डायरी मिली जो काफी पुरानी और धूल लगी थी।शीला उस डायरी को अपने उँगलियों से एक एक पन्ने को पलट रही थी कि अचानक डायरी के बीच से एक पन्ना निकल कर हाथ में आ गया जिसे पढ़ कर शीला के पैरों तले जमीन खिसक गए  हाथ पाव बिल्कुल ठंडे हो गए उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस निशांत को उसने इतना चाहा उसकी याद में अपनी जिन्दगी निकाल दी।
आज वही  निशांत उसे कैसे धोखा दे सकता है।उस डायरी में निशांत ने अपने सारे कारनामें रिकार्ड कर रखे थे वह बहुत बड़ा स्मगलर  था उसके जीवन में कई लड़कियाँ थी। शीला उस पन्ने को पढ़कर मूर्छित होने लगी तभी उसकी मेहरी आयी और शीला को कमरे में गयी हाथ,पाव में तेल की मालिश कर दी लेकिन  शीला की आँखे अभी भी पथराई हुई थी शरीर बिल्कुल बेजान और क्षणभंगुर होने गया। शीला पहले  से ज्यादा  बिल्कुल शांत और गंभीर हो गयी। एक रात शीला घर का दरवाजा खोल घर से निकल पड़ी शायद बर्फ की रेतीली तूफान में न जाने कितना गम लिए वह जिन्दगी के हर मोड़ पर तन्हाई और बेवफ़ा को झेल रही थी |

रंजना झा

1 COMMENT

  1. बहुत अच्छी रचना है, मैं अभी पढ़ पाया. पता नहीं क्यों ध्यान नहीं पर पाया था, देर से पढ़ने के लिए खेद है किन्तु “बर्फीले तूफ़ान” में शीला और निशान्त की कहानी अच्छी लगी. बहुत बहुत धन्यवाद और हार्दिक शुभ कामनायें

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