बवाना में एक कारखाने में लगी आग, जिसमें मरे 17 मजदूर

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जनवरी 2018 में बवाना में एक कारखाने में आग लग गई जिसमें जिसमें 17 मजदूर थे कथित तौर मारे गये और इसमें कई महिलाएं भी शामिल थीं, । इफ्टू की एक टीम ने तथ्यों को जानने के लिए और दुखी परिवारों के साथ एकजुटता व्यक्त करने के लिए वहां गई। 21/01/2018 को दिल्ली कमेटी की एक टीम बवाना सेक्टर 5 तक पहुंच गई जहां मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 17 श्रमिक मारे गए थे। हमने देखा है कि बावाना में चलने वाले अधिकांश कारखाने अत्यधिक
प्रदूषण्कारी होते हैं जैसे प्लास्टिक इंजेक्शन मोल्डिंग, जूते, जींस डाइंग आदि। यह औद्योगिक क्षेत्र 5 सेक़्टरों में विभाजित है जहां 5 से 6 लाख मजदूर काम कर रहे हैं। महिलायें बहुत बड़ी संख्या में है। हमने यह भी पाया कि औसतन मजदूर को प्रति माह 5000-6000 रुपये का मामूली सा वेतन दिया जा रहा है। मजदूरों को बुनियादी कानूनी सुविधायें जैसे ईएसआई भविष्य निधि और न्यूनतम मजदूरी नहीं दी जाती। 10-12 घंटे का कार्य दिवस एक आम बात है। प्रदूषण नियंत्रण के कोई उपाय नहीं किए जाते हैं और मजदूरों की सुरक्षा का भी कोई प्रावधान नहीं है। यह फैक्टरी में एफ -83 में सेक्टर 5 में स्थित है। किसी भी फैक्टरी में कोई भी बोर्ड नाम प्रदर्शित नहीं करता है। वहां काम करने वाले श्रमिक भी नाम से अवगत नहीं हैं। यह कारखाना पिछले 6 वर्षों से चल रहा है। शुरू में एक गत्ता मैन्युफैक्चरिंग यूनिट थी, लेकिन बाद में प्लास्टिक की थैली बनाने शुरू कर दिया। 1 जनवरी से इस साल इस सौ गज के प्लॉट के तहखाने में पटाखे का गोदाम शुरू किया गया था। इस इमारत में तहखाना, भूतल और पहली मंजिल है।
निकटवर्ती कारखाना एफ -83 भी पटाखा कारोबार में शामिल है। हालांकि 20 को छुट्टी थी लेकिन प्रबंधन ने काम के लिए सभी 50 कर्मचारियों को बुलाया था। गेट को चेकिंग और श्रमिकों से बचने के लिए लॉक किया गया था जहां अंदर काम कर रहे थे अधिकांश श्रमिक महिलाएं थे और पटाखे की पैकिंग में शामिल थे। शाम में करीब 5:30 बजे मुख्य द्वार पर आग लग गई। तहखाने से पहली मंजिल तक पटाखों के लिए इस्तेमाल सामग्री के अटी हुई थी इसने एक आग में फैलाने की सुविधा दी है और मजदूर को जिंदा जल गये। हमेशा की तरह, श्रमिकों के लिए कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी यहां तक कि खिड़कियां और दरवाजे भी लोहे से बने था, अतः बच निकलना असंभव था।

हमने कई श्रमिकों से बात की थी हमने पाया कि एक महिला और 24 वर्ष की आयु के आदमी ने खुद को बचाने के लिए छत से छलांग लगाई और इस प्रक्रिया में बुरी तरह घायल हो गए। अब वे अम्बेडकर अस्पताल में जीवन के लिए जूझ रहे हैं। तीन लोगों को पहचान नहीं हो सकी। फ़ैक्टरी परिसर में सभी सुरक्षा मानदंडों और कानूनों का उल्लंघन होता रहा व इस काम पुलिस और श्रम विभाग की मिलीभगत थी। केवल कुछ बड़ी घटना होने पर सरकार जागती है और यहां भी केवल अपने को बचाने के लिए कुछ दिखावटी उपाय ही किये जातें हैं। साथ की चाय की दुकान वाले ने हमें बताया कि शाम को करीब 35 कप चाय भेजी गई, जो दर्शाती है कि मीडिया में रिपोर्ट की तुलना में मौत की संख्या बहुत अधिक है। कई परिवारों ने अपनी रोटी कमाने वाले को खो दिया है और कई जगह दोनों पति पत्नी जल गये छोटे बच्चों को भाग्य के सहारे छोड़ कर। हमने बार बार श्रम विभाग और श्रम मंत्री के समक्ष औद्योगिक दुर्घटनाओं का मामला लाया है। हमने
मांग की है कि कारखाने निरीक्षकों की संख्या में वृद्धि हो, उन्हें इलाके में तैनात किया जाना चाहिए और नियमित जांच की जानी चाहिए। पर इन तीन वर्षों में सरकार द्वार कुछ भी नहीं किया गया है। श्रम मंत्री, कारखाने निरीक्षकों को इलाके में तैनात करने के स्थान पर आप के विधायकों के लिए श्रम कार्यालय में जगह आवंटित करने में व्यस्त हैं। यह स्पष्ट रूप से सरकार की प्राथमिकता को दर्शाता है। फैक्टरी निरीक्षकों ने खुद कोई नियमित जांच नहीं की है और न ही शिकायत पर भी। प्रक्रिया लंबी है। न केवल प्रक्रिया लंबी है, निरीक्षण मुश्किल से असलियत को सामने लाता है और शायद ही कभी काम के असुरक्षित वातावरण को सुधारने के लिए कोई कार्रवाई की जाती है। शायद ही कभी मालिक के खिलाफ किसी भी का र्रवाई के लिए सुना गया। यह दोनों के बीच एक बड़ी मिलीभगत दर्शाता है, क़योंकि एक  आम आदमी भी देख सकता है कि सुरक्षा मानदंडों का नहीं हैं। निरीक्षकों को किसी भी ऐसी घटनाओं के लिए सीधे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए। उच्च संख्या में महिलाओं और कम मजदूरी के कारणों की भी जांच होनी चाहिए। कम वेतन पति-पत्नी दोनों काम करने को अनिवार्य बनाते हैं। हालांकि, उत्पादन गतिविधि में भाग लेने वाले महिलाओं को देखना अच्छा है, लेकिन यह न केवल मजबूरी के चलते है बल्कि उन्हें पसंद किया जाता है क्योंकि उन्हें कम वेतन में काम करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
किसी भी श्रम अधिकारों के न होने के लिये लिए यूनियनीकरण का खराब स्तर जिम्मेदार है। श्रमिकों को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी का लगभग आधा भुगतान किया जा रहा है, और अन्य वैधानिक लाभ ईएसआई, पीएफ, बोनस आदि हैं। जब तक और प्रबंधन के खिलाफ मजबूत और सुनिश्चित कार्रवाई की गारंटी न हो, ऐसी घटनाओं को रोका नहीं जा सकेगा नहीं होगा। मुनाफे की न मिटने वाली हवस के चलते श्रमिकों को वस्तुतः मारने के लिए प्रबंधन में अधिकतम 2 साल की सजा दी गई है। मानव जीवन के प्रति उनकी बेरुखी और हवस लागत को कम करने के लिए सुरक्षा मानदंडों का पालन नहीं करने के लिए मजबूर करता है। केंद्र सरकार को भी इसके बारे में सबक लेना चाहिए और मालिकों को कड़ी, सुनिश्चित व जल्द सजा देने के लिए कानून को बदलने का प्रस्ताव करना चाहिए। यद्यपि यह पर सरकार की ओर से बहुत अधिक मांग होगी जो वर्तमान श्रम कानूनों को ध्वस्त कर उन्हें मालिक परस्त कानूनों से बदल रही है।
हमारी माँग है

1. इस घटना के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार दिल्ली सरकार और श्रम मंत्री गोपाल राय को अपने
कार्यालय में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है और इसलिए उन्हें इस्तीफा देना चाहिए।
2. क्षेत्र के कारखाने निरीक्षक को गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए और उसके खिलाफ हत्या के
मुकदमे आपराधिक कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए।
3. सुरक्षा और सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करने के लिए प्रबंधन और मालिक की जिम्मेदारी है,
इसलिए मालिक को केवल गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन उसके खिलाफ आईपीसी की
302 के तहत कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए।
4. दिल्ली सरकार को औद्योगिक दुर्घटनाओं के मामलों को देखना चाहिए।
5. औद्योगिक दुर्घटना के मामलों में मालिकों को जमानत नहीं दी चहिये। केवल एक कड़ी और
सुनिश्चित सज़ा से ही मालिक डरते हैं और इसी से उचित सुरक्षा उपायों को अपनाने और व बचने
लायक दुर्घटनाओं को रोकने को मजबूर होंगे।

 

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