भक्ति और शक्ति के प्रस्थान कवि है गुरु गोविंद सिंह

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“रीतिकालीन कविता में राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति का स्वर गुरु गोविंद सिंह की कविता में स्पष्ट दृष्टिगत है।  उनका जीवन और उनकी रचनाधर्मिता भक्ति और शक्ति की अपरिमित साधना का प्रतिफल है। वे हिंदी साहित्य में भक्ति और शक्ति के प्रस्थान कवि हैं।” ये शब्द  ‘विद्योमशैल साहित्यिक संस्था’ द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला के उद्घाटन व्याख्यान के अवसर पर दिल्ली के वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो. हरीश अरोड़ा ने कहे। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय साहित्य में रीतिकाल को श्रृंगार, प्रेम और आश्रयदाताओं की प्रशंसा का साहित्य कहा जाता रहा है।  लेकिन गुरु गोविंद सिंह की राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतिमानों को अभिव्यक्त करने के साथ उन्हें संरक्षित भी करती है। वे  शस्त्र और शास्त्र की समन्वित चेतना को संजोने वाले संत-सिपाही थे। इस अवसर पर संस्था का परिचय देते हुए वेद प्रकाश ने कहा कि युवाओं की इस संस्था का उद्देश्य साहित्य की विभिन्न धाराओं के पुनर्पाठ द्वारा नई दृष्टि को सामने लाना है। कार्यक्रम के आरंभ में श्रवण कुमार ने डॉ हरीश अरोड़ा के परिचय देते हुए बताया कि वे विभिन्न विषयों के गंभीर अध्येता और आलोचक होने के साथ श्रेष्ठ रचनाकार भी हैं। फेसबुक पर सीधे प्रसारण द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम  के अंत में ध्रुव कुमार ने वक्ता और सभी श्रोताओं के आभार व्यक्त किया।

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