क्या 2022 तक भारत गरीबी मुक्त हो पायेगा ?

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हाल ही में नीति आयोग ने 2022 तक भारत के गरीबी मुक्त होने का दावा किया है। खैर ! यह अनुमान सच होगा भी कि नहीं ये तो भविष्य ही तय करेगा। लेकिन इस अवसर पर गरीबी मिटाने के लिए किये जा रहे सरकारी प्रयासों की पोल तो खोली ही जानी चाहिए। सबसे पहले तो भारत जैसे देश के लिए गरीबी कोई नई समस्या नहीं है। यूं कहे तो भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हमें आजादी के साथ गरीबी तोहफे में मिली। आजादी के बाद से भारत में पंचायत से लेकर प्रधानमंत्री तक का चुनाव गरीबी के मुद्दे पर लड़ा और जीता गया। जनता हर बार इस आशा के साथ सियासी दलों को वोट देती रही है कोई न कोई प्रतिनिधि उनकी गरीबी मिटायेगा। लेकिन हर बार जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ ही हुआ। न जाने कितनी ही सरकारे आयी और गयी। लेकिन गरीबी टस से मच नहीं हो पायी। यहां तक गरीबी मिटाओ के अहम मुद्दे के साथ इंदिरा गांधी ने चुनाव लड़ा और जीती। लेकिन उनके शासनकाल में भी गरीबी के बजाय गरीब ही भूख से बिलखकर दम तोड़ते रहे। यह हमारे देश की विडंबना है कि जो भारत एक समय में सोने की चिड़िया कहलाता था, आज उसका हाल खस्ता है। अब तो लगता है कि सियासी पार्टियों के लिए गरीब और गरीबी केवल और केवल मनोरंजन करने का झुनझुना भर बनकर रह गये है। गरीबों के हक की लड़ाई लड़ने वाले जननायकों का बीते दस दशकों से देश में अभाव ही देखने को मिल रहा है। गरीबों से न तो सरकार को और न ही पूंजीपतियों को कोई सरोकार रह गया है। यहीं कारण है कि आज भी गरीब का बेटा आसमान ओढकर फुटपाथ पर सोने को विवश है। आये दिन कोई न कोई अपने चार पहिया वाहन से इन गरीबों की जान के साथ खेलता रहता है। लेकिन इन सब के विपरीत सरकार की नींद खुलती ही नहीं है।
बस ! सरकार के अनुसार गरीब की परिभाषा यही है कि शहरी क्षेत्र में प्रतिदिन 28.65 रुपये और ग्रामीण क्षेत्र में 22.24 रुपये कम से कम जिसकी आय है वे सब गरीबी रेखा में सम्मिलित है। आज जहां महंगाई आसमान छू रही है, क्या वहां 28 और 22 रुपये में एक दिन में तीन वक्त का पेटभर खाना खाया जा सकता है ? क्या यह गरीबों का मजाक नहीं है ? सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार 30 रुपये प्रतिदिन की आय कमाने वाला भी गरीब नहीं है। शायद ! हमारे जनप्रतिनिधियों को इस बात का ध्यान ही नहीं है कि गरीबी में गरीबों को कितनी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। गरीबी केवल पेट का भोजन ही नहीं छिनती है बल्कि कई सपनों पर पानी भी फेर देती है। गरीबी बच्चों की पोथी, मां-बाप की दवाई, भाई की पढाई, मांग का सिन्दूर इत्यादि छिन लेती है। लेकिन इन सब बातों से बेगैरत हमारे नेता गरीबी को लेकर अभी भी संजीदा नहीं है। हम भारत को न्यू इंडिया तो बनाना चाहते है पर गरीबी को मिटाना नहीं चाहते। हमारे प्रयास हर बार अधूरे ही रह जाते है। क्योंकि हमने कभी सच्चे मन से इस समस्या को मिटाने को लेकर कोशिश की ही नहीं है।
गरीबी एक बीमारी है। यह बीमारी जब तक भारत को लगी रहेगी, तब तक भारत का विकासशील से विकसित बनने का सपना पूरा नहीं हो सकता है। वास्तव में गरीबी इतनी बडी समस्या नहीं है जितनी बढ चढकर उसी हर बार बताया जाता है। सच तो यह है कि गरीबों के लिए चलने वाली दर्जनों सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें मिल ही नहीं पाता। जिसका एक कारण अज्ञानता का दंश भी है। हालांकि, वर्तमान सरकार द्वारा डिजिटिकरण इस दिशा में सार्थक कदम साबित होगा। अब केंद्र व राज्य सरकारों से गरीबों को मिलना वाला लाभ सीधा उनके खातों में पहुंच जायेगा। दरअसल गरीबी के बढने का प्रमुख कारण जनसंख्या का लगातार अनियंत्रित तरीके से वृद्धि करना है। यदि हम भारत के संदर्भ में देखे तो आजादी के बाद से साल दर साल हमारे देश की जनसंख्या में इजाफा होता गया है। जिस सीमित जनसंख्या को ध्यान में रखकर विकास का मॉडल व योजनाएं बनायी गयी हर बार जनसंख्या वृद्धि ने बाधा उत्पन्न की है। वस्तुतः विकास धरा का धरा रह गया। आवश्यकता है कि हम जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में न केवल जागरुकता लाये बल्कि दो बच्चे ही अच्छे की नीति के आधार पर सरकारी सेवाओं का लाभ भी तय करे।
अंततः किसी भी सरकार की यह नैतिक जिम्मेदार होती है कि नागरिकों को पौष्टिक एवं गुणवक्तापूर्ण आहार उपलब्ध कराये। शादियों व समारोह में व्यापक फलक पर हो रही भोजन की बर्बादी को लेकर कडे कानून बनाने व उसके सफल क्रियान्वयन की महती आवश्यकता है। गरीबों को रोजगार उपलब्ध कराकर उनके बच्चों के लिए शिक्षा का उचित प्रबंधन करना होगा। गरीबों के लिए जल, भूमि, स्वास्थ्य व ईधन में विस्तार किया जाये। गरीबों के लिए आर्थिक नीतियां बनाये जाएं और पूंजीवादियों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं में फेर बदल किये जाने की आवश्यकता है।
– देवेंद्रराज सुथार 

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