भय, कारण व निवारण

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श्री राजेश्वर शर्मा  
       ईश्वर ने इस विश्व की रचना में लाखों प्रकार के जल, थल वायु में विचरण करने वाले प्राणी पैदा किये और उससे भी अधिक प्रत्येक प्राणी को विशेष गुणों से नवाजा। प्रत्येक को अद्वितीय शरीर व गुणों से भरपूर किया परंतु इसके उपरांत भी उसने कुछ गुण सभी प्राणियों में सामान्य रूप से समोहित किये यथा जन्म मृत्यु, भूख, प्रजन्न, शक्ति व भय। हम सभी गुणों पर सदैव चर्चा करते रहते हैं और महसूस भी करते हैं परंतु भय लगभग अछूता रह जाता है और हमें लगता है कि भय केवल मानवमात्र का या व्यक्तिगत रूप से हमारा अपना गुण है जबकि यह धारणा पूर्णतया अपना गुण है जबकि यह धारणा पूर्णतया गलत है। भय हर प्राणी में व्याप्त है चाहे वह राजा हो या रंक, चाहे वह शेर हो या चूहा। अतः जीवन को शांत व प्रसन्नतापूर्वक जीने के लिए हमें भय के कारण और निवारण का ज्ञात होना आवश्यक है।
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में सुंदर कांड में जब समुद्र ने रास्ता देने से मना किया तो एक चौपाई के माध्यम से भय को चिन्हित किया- भय बिन प्रीत न होई अर्थात् भय के बिना प्रीत संभव नहीं है हमें जीवित रहने के लिए बहुतों के सहयोग, सहायता की आवश्यकता पड़ती है और सदैव संशय बना रहता है कि कहीं हम उस व्यक्ति या वस्तु को न दें जिस पर हमारे जीवन की आधारशिला टिकी है, जैसे बच्चे की माॅं पर और बुढ़ापे की संतान पर लगता है हम जीवन में एक-दूसरे पर आक्षित है। अतः यह तो सत्य है कि हम जीवन में जो भी कर्म करते हैं उसमें कहीं न कही भय व्याप्त है हम चाहे उसे प्यार का नाम दे दें कि माॅं बच्चे को प्यार के वशीभूत पल्लवित करती है परंतु कहीं न कहीं यह भाव भी होती है कि वहा जब हम जीवन में आशव होंगे तो यही संतान हमारा सहारा होगी। पति-पत्नि के संबंध को हम प्यार कहते है परंतु उसमें एक-दूसरे को खोने का डर है कि पत्नी को मालूम है कि कहीं पति ने त्याग दिया तो सामाजिक व आर्थिक दशा बिगड़ जायेगी, वह भय से न चाहते हुए भी प्यार का दिखावा कर सकती है। कर्मचारी व स्वामी में भी कहीं न कहीं भय होता है नौकरी जाने का और अच्छा कर्मचारी न मिलने का। अतः जीवन के हम संबंध व कर्म की गहराई में जाने पर आपको भय की कम या अधिक मात्रा अवश्य दिखाई देगी। अतः जीवन में भय को अवश्य भावी मानकर हम उस विभिन्न मुख्य स्वरुपों का विश्लेषण करते हैं

1.  मौत का भय-
सभी जीवित प्राणियों में मौत का भय जन्म लेते ही आरंभ हो जाता है। जीवित रह की अवधि किसी की भी नियमित नहीं होती, अतः ज्ञान के साथ-साथ मौत के भय का साया हमारे इर्द-गिर्द जीवन के सफर में जन्म से मृत्यु तक बना रहता है। हमें हर उस प्राणी से जिससे हमें जीवन की हानि होने की, संभावना हो उस परिस्थिति से जो मौत का कारण बन सकती है, डर और भय लगता है हम उससे बचाव में ही हित समझते हैं जैसे बच्चे बिल्ली, कुत्ते अन्य जानवर या अनदेखे भूतप्रेत से डरते है ओर यह प्रवृत्ति सदैव बनी रहती है और देखा गया है कि बड़े होने पर भी स्त्री-पुरुष बचपन के भय से बाहर नहीं आते। अंतः सभी को यह ज्ञात है कि मृत्यु निश्चित है परंतु आयु पूर्ण होने पर भी शरीर से पूर्णतः अशक्त होने पर भी मनुष्य मृत्यु का स्वागत नहीं करता, उससे दूर रहता है उसकी इच्छा कभी भी, किसी भी आयु में मृत्यु या आलिंगन करने की नहीं होती। अतः मृत्यु का भय ही सर्वोच्च भय है इसी मृत्यु के भय का दोहन कर असामाजिक तत्व लाभ उठाते है और दैहिक, आर्थिक व शारीरिक शोषण करते हैं।

2. शारीरिक भय-
  मृत्यु से कुछ कम हमें शरीर को सुरक्षित रखने का भय सदैव रहता है हमारे शरीर के अंग उचित कार्य करे व सुरक्षित रहें कोई भी दुर्घटना हमारे साथ या हमारे अपनों के साथ कभी न हो। सुंदर स्त्री को अपनी सुंदरता के द्वारा होने का, बलिक पुरुष को शक्ति कम होने का भय रहता है। किसी कला में दक्ष व्यक्ति को दक्षता समाप्ति का भय होता है और इस भय का दोहन स्वार्थी लोग करते हैं। सुंदर, स्त्री को पाने के लिए कई दफा बलिष्ठ व हिंसक पुरुष हिंसा का सहारा लेते है जैसे तेजाब से सुंदरता नष्ट करना अंग भंग करना इत्यादि, सुंदरता के, अवगुणों में से एक है। जीवन में जो तत्व हमे शब्दों से श्रेष्ठ बनाता है उसी तत्व की समाप्ति, भय या एक महत्वपूर्ण कारण होता है।

3.आर्थिक भय-
हम जीवन को आनंदमय,संपन्नता पूर्वक जीना चाहते है और हम में से कुछ मेहनत करके, विरासत में या किसी स्त्रोत से धन-धान्य प्राप्त करते हैं जिससे कि हम अपना भविष्य का जीवन सुविधा संपन्न होकर जी सकें। जैसे-जैसे संपन्नता बढ़ती है हमारे अंदर उस संपन्नता सुविधाओं के खोने का या समाप्त होने का भय बढ़ता जाता है। हमें लगता है कि ये सुविधायें यदि समाप्त हो गई तो जीवन यापन कैसे होगा और यही भय हमें जीवन में जगह-जगह भटकने को मजबूर करता है तथा हम उन शर्तो को मानते है जो आत्मा नहीं मानती। विशेष तौर पर महिलाओं को कर्म परिस्थितियों में सुविधाओं के लिए आत्मा का बलिदान करना पड़ता है। कर्मचारियों को अधिकारियों की अनुचित बातें माननी पडती हैं। संयुक्त घरों के अंदर किसी एक महिला या पुरुष जिसका सुविधाओं पर अधिकार है आदेश व शर्तें माननी पड़ती है क्योंकि उस व्यक्ति के नाराज होने पर हम आर्थिक रूप से सक्षमता खोने के भय से पीड़ित होते है।


4. सामाजिक प्रतिष्ठा-
    सामाजिक प्रतिष्ठा सदैव एक मानसिक सुख या अनुभव करती है। हम में से सभी प्रतिष्ठित होना चाहते है। परंतु जैसे ही हम आम आदमी से ऊपर उठते हैं तभी हमें लगता है कि हमारे विरोधी हमें नीचा दिखाने में प्रयत्नशील हैं। इस कशमकश में हम से कुछ सही गलत की परवाह न करके किसी भी प्रकार से प्रतिष्ठा कायम रखना चाहते है। वास्तविकता यह है कि सामाजिक प्रतिष्ठा एक मानसिक रोग है जो कभी-कभी भय में परिवर्तित हो जाता है। इस भयमुक्ति का बहुत सरल उपाय यह है कि अपने सामाजिक कर्माे को सत्यता ईमानदारी व सेवाभाव पर आधारित रखें। कोई कर्म, पद प्राप्ति हेतु न कर जनहित में करें। दुनिया राजा-महाराजाओं, प्रधानमंत्री व राष्ट्रपतियों तक को भूल गई हम क्या है? सामाजिक प्रतिष्ठा के लिये कोई आत्मिक समझौता न करें, असामाजिक लोगों की सहायता न लें केवल सत्यकर्म, ईश्वर व समाज को समर्पित करते हुये करें। शास्त्रों में कहा गया है, हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ कर्म करो फल ईश्वर पर छोड़ दो।

5. प्रेमीजनों का वियोग-
     किसी भी प्रेमीजन का मिलना बिछुडना जीवन का एक अपरिहार हिस्सा है। मिलन के दिन ही विलग होने के दिन कम होने लगते है। हर प्रेमी जीवन के सफर के सहभागी है। प्रेमी से अलग हम मुख्यतः दो कारणों से अलग होते हैं जिसमें प्रथम मृत्यु जिस पर हमारा कोई अधिकार नहीं, दूसरा भय का एक मुख्य कारण है हमारे द्वारा छिपकर किये कुकृत्य, असामाजिक व अनैतिक कार्य, बेईमानी, हेरा-फेरी यह भय तब और अधिक दर्दनाक हो जाता है यदि हमने ऐसा कृत्य किसी के साथ मिलकर किया हो या दोस्ती, प्यार और विश्वास में किसी छदम् साथी से शेयर कर लिया होता हो।
यह कृत्य हमारा जीवन भर पीछा करता है। हम उन व्यक्तियों से दोस्तों और प्रेमियों से सदैव डरते है कि कहीं वे सत्य उजागर न कर दें। कुछ असामाजिक व्यक्ति या तत्व हमें शाारीरिक, आर्थिक, मानसिक दोहन कर उनका दुरुपयोग करते हैं और आत्महत्या तक व्यक्ति को मजबूर होते देखा गया है स्त्रियों का सामाजिक दोहन होता है।
यह डर मौत के डर से भी ज्यादा भयानक होता है परंतु इस भय से मुक्ति सरल है।
1. कभी भी लोभ, लालच, डर, मस्ती व सुख के लिये कोई अनैतिक, असामाजिक, अपराधिक कार्य नहीं करें चाहे हमें कुछ समय कष्ट भी सहने पडे़।
2. जीवन के गोपनीय तथ्यों को, घटनाओं को किसी भी अवस्था में किसी भी व्यक्ति को चाहे वह कितना भी प्रिय हो उजागर न करें, चाहे संबंध टूट भी जाए इस कारण। सत्य मानें यदि आपने किसी एक को भी बताया तो मानकर चलें समय के साथ वह सार्वजनिक हो ही जायेगा। तुम्हारी एक चुप्पी जीवन को सदैव आनंदमय बनाये रखेगी।
3. किसी भी मित्र या व्यक्ति से मिलकर किसी प्रकार का कुकृत्य कभी न करें।
4. इसके उपरांत यदि कोई आपको धमकी देता है, ब्लैकमेल करने की कोशिश करता है तो उसका आरंभ में मुकाबला करें, जरुरत हो तो कितना बड़ा गलत कार्य भी किया हो अपने माता-पिता, पिता या भाई को बताएं परंतु किसी के दवाब में  आकर न झुकें, नहीं तो आपका जीवन नरक बन जाएगा और आप अपनी ही आत्मा की नजरों में गिर जाओगे और शर्तिया शारीरिक, आर्थिक सामाजिक क्षति उठाओगे।
6. पाप-
जीवन में कोई भी व्यक्ति पूर्ण ज्ञानी नही होता। पाप और पुण्य की परिभाषा, समय, स्थान व्यक्ति के अनुसार बदलती रहती है। यह भय किसी हर तक आवश्यक है क्योंकि यह हमें समय पर गलत कार्यो से दूर रखता है जीवन को बार-बार सही दिशा देता रहता है। इसका उपाय बहुत सरल है। किसी भी प्रकार के कृत्य करने से पहले या करते समय यदि तुम्हारी आत्मा जो प्रभु का अंश है तुम्हें उस कृत्य को करने से मना करता है तो उस कार्य को मत करो। यदि तुम्हारी आत्मा तुम्हारे साथ है तो किसी भी कार्य को सत्य मानते हुए करो चाहे समाज, संबंधी उसे न स्वीकारें। किसी भी अवस्था में अपनी आत्मा को स्वयं धिक्कारने का अवसर न दें।
  अतः भय से मुक्ति बहुत ही आसान है परंतु जीवन में सत्त रूप रूप से हमें प्रयत्नशील रहना आवश्यक है। जीवन को आनंदमय, प्रेममय, वैभवमय बनाने के लिये भय मुक्त जीवन अपनाना है। हमें ईश्वर ने जन्म को गरिमापूर्ण जीने को दिया है उसे गॅवाये न, भरपूर जीयें।

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