भेड़ें खुश हुई -डॉ पुष्पलता

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भूख प्यास में डकरा ती भेड़ें रोज घट जाती
भेड़ियों ने सभा की
बाघ बोला आज से सारी भेड़ों की जिम्मेदारी मेरी  18119103_1144730058972047_3327077530854154373_n
भेड़ें खुश हुई
भेड़ियों के कान में बोला
मेरे भोजन की जिम्मेदारी तुम्हारी
बचा खुचा तुम्हारा
तुम्हारी सुरक्षा करूँगा
भेड़ियों ने ताली बजाई
पशुओं के नए मसीहा
के उदय होने का जश्न मना
भेड़ें टूट कर नाची
ठिकाना नहीं था खुशी का
भेड़ें फिर कम हुई
फिर भूख प्यास से डकरायी
भेड़िये बोले बड़ी उपलब्धि के लिए
थोड़ी भूख प्यास सहनी पड़ती है
भेड़ें आश्वस्त हुईं
भेड़ियों ने कहा ये गर्व की बात है
हमें इतने ताकतवर बाघ का संरक्षण मिला
भेड़ें मुस्कराई
मन रहा है बाघ का जश्न
इतंजाम कर रहे हैं
तंदरुस्त भेड़िये
नाच रहीं हैं
मरियल गायब होती जा रही भेड़ें
 कविता लिखते लिखते
कवि हो गया ढेर
हवा उड़ाकर कचरे में ले गयी
लहू में डूबी हुई  कविता को
फिर उगा कवि लहू की बूंद से
रक्त बीज की तरह
दांतों तुम एक दिन
टूटोगे जरूर
मीडिया का पेस्ट कब तक
बचाएगा
मगर बाघ फिर आ जायेगा
नए रूप में
भेड़िये रहेंगे तंदरुस्त
 बाघों तुम्हें तो सरकारें बचाएंगी
भेड़ियों को तुम बचा लोगे
भेड़ों की ऊ न तो आदमी उतार
लेंगे
 आदमी खा जाएंगे
उन्हें
डॉ पुष्पलता

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