बिन बेटी सब सूना…..

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खनाक!!!
किचन से कप टूटने की आवाज आई
अनामिका भागते हूए किचन में पंहुची। सामने रोज़ी सिर झुकाए खड़ी थी। अनामिका उसके ऊपर बरस पड़ी,
“एक काम भी सही से नहीं कर सकती। टी सेट खराब कर दिया। मालुम है कितना कीमती था ये सेट?”
“साॅरी मैडम”
“साॅरी बोलने से क्या कप जुड़ जाएगा?”
तभी बंटी अंदर आते हुए बोला,
“मम्मी आज डिनर में छोले भटूरे और पुलाव बना लो। बहुत दिनों से आपने कुछ भी अच्छा नहीं बनाया।”
“हाँ हाँ.. मैं तो कभी कुछ करती ही नहीं हूँ। और न ही मुझे कुछ बनाना आता है। हमेशा सड़ा खाना बनाती हूँ।”
“माँ मैने ऐसा तो कुछ नहीं कहा जो, आप इतना नाराज हो रही हैं। मत बनाइए कुछ, मैं खाना ही नहीं खाऊंगा आज।”
बंटी को भी गुस्सा आ गया। वो टीवी ऑन करके बैठ गया। अनामिका पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गयी और भड़ाक की तेज आवाज के साथ दरवाजा बंद कर लिया। अंदर आकर अनामिका ने गुस्से में बेड पर रखी सारी तकिया और कुशन जमीन पर फेंक दिए। और कटे पेड़ की तरह मुँह के बल बिस्तर पर गिर पड़ी। आंखों से अश्रुधारा बह निकली। वो रोने लगी।
थोड़ी देर रो लेने के बाद, वो उठी वाॅशरूम में जाकर मुँह धोया और किचन में जाकर छोले पानी में भिगो दिये। एक बार उसने बंटी की ओर देखा। बंटी ने झट से टीवी बंद किया और पढ़ने बैठ गया।
इधर कुछ महीनों से ऐसा ही हो रहा था। अनामिका बिना किसी बात के चिड़चिड़ाने लगती। बिना बात के सबके ऊपर गुस्सा करती और बिना बात ही बंटी पर बरस पड़ती। और फिर खूब रोती। उसे ऐसा लगता जैसे वो अकेली है उसका कोई नहीं है। उसके अंदर नकारात्मकता आने लगी थी। उसका आत्मविश्वास तो जैसे खत्म हो रहा था। कोई था नहीं जो उसे सुने और समझे। बंटी से बड़ी उसकी एक बेटी थी वो अहमदाबाद में एम बी ए कर रही थी। अगले महीने वो कोर्स पूरा करके वापस आने वाली थी। दो साल पहले बेटी के अहमदाबाद चले जाने के बाद वो घर में अकेली सी हो गयी थी। पिछले साल जब बेटी आयी थी, तो अनामिका को फेसबुक और वाट्सएप चलाना सिखा गयी थी। फेसबुक से जुड़ने के बाद तो अनामिका की जैसे दुनियाँ ही बदल गयी। वो फेसबुक पर खूब दोस्त बनाती और खाली समय में थोड़ा बहुत लिखती या दूसरों की पोस्ट कमेंट करती। फेसबुक पर उसके कुछ बहुत अच्छे दोस्त बन गये, कुछ पुरानी सहेलियाँ भी अनामिका को मिल गयीं। फिर क्या था जब उसके  पति लोकेश ऑफिस चले जाते और बेटा स्कूल, तो अनामिका फेसबुक खोलकर बैठ जाती और इस तरह उसका दिन आराम से कट जाता।
वो बहुत अच्छा लिखती थी। लेकिन इधर कुछ दिनों से उसका मन फेसबुक से उचट गया था। वो न तो कुछ लिखना चाहती और न ही किसी को पढ़ना। Always mast रहने वाली अनामिका अब उदास रहने लगी। वो अकेले रहना तो चाहती लेकिन अकेलापन नहीं चाहती थी।
लेकिन चाहने न चाहने से क्या होता? फेसबुक पर ढेरों लोगों के बीच भी अकेलापन काटने को दौड़ता। इस तरह वो फेसबुक से भी दूर रहने लगी। फेसबुक से दूर होने से भी कुछ नहीं हो सकता था क्योंकि वास्तविक दुनियाँ में भी ऐसे लोग भरे थे, कुछ खून के रिश्तों को छोड़कर बाकी सब रिश्तों के गुणा भाग में लगे रहते। हर जगह नीरसता थी। ऐसे में उसे एक ऐसे दोस्त की जरूरत थी जो उसे सुने, समझे और कहां वो गलत है उसे समझाए? ऐसा दोस्त जो उसे अपनेपन का एहसास कराए। जो उसके बिना कहे ही उसके मन को समझ ले। लेकिन उसके आसपास कोई नहीं था ऐसा। लोकेश को अपने बिजनेस से समय नहीं मिलता था। बेटा अपनी पढ़ाई में व्यस्त था। बेटी से जितना हो सकता, वो फोन पर अनामिका को समझाती रहती। बाकी उससे जुड़े जो भी लोग थे वो अपनी दुनियाँ में मस्त थे। इस तरह धीरे धीरे वो चिड़चिड़ी होती जा रही थी। कभी कभी उसकी नीरसता उसपर इस कदर हावी हो जाती कि उसे लगता वो सबसे हमेशा हमेशा के लिए दूर चली जाए। लेकिन उसकी जिम्मेदारियाँ उसे रोके हुए थी।
अगले महीने अनामिका की बेटी तूलिका घर आ गयी। उस दिन घर में किसी उत्सव जैसा माहौल था। अनामिका तो बस तूलिका के आगे पीछे हो घूम रही थी। रात तक सब हंसते खिलखिलाते रहे। अनामिका अपनी सारी उदासी भूल गयी थी। अगले दिन सुबह तूलिका की आँख अनामिका की जोर जोर की आवाज से खुल गयी। उसने उठकर बाहर जाना चाहा तो बंटी ने कहा,
“दीदी लेटी रहो..ये तो मम्मी का रोज का काम है। वो बिना किसी बात के रोजी आंटी के ऊपर चिल्ला रही होंगी।”
तूलिका चुपचाप लेटी सब कुछ समझने का प्रयास कर रही थी। लंच में अनामिका ने तूलिका की पसंद का खाना बनाया था। सभी लोग खाना खा रहे थे तभी बंटी ने मजाक में कह दिया,
“चलो दीदी के आने से कुछ अच्छा तो खाने को मिला।”
“हाँ वैसे तो तुमको सूखी रोटियाँ ही मिलती हैं? इतना ही है तो खुद क्यों नहीं बना लेते। बीबी आएगी तब देखूंगी कितना कानून बताते हो?”
ये कहकर अनामिका खाना छोड़कर उठ गयी। बंटी ने भी गुस्से में खाना नहीं खाया। तूलिका चुपचाप बैठी थी। ये सब देखकर उसकी आंखें नम हो गयीं। एक साल पहले उसकी मम्मी कितनी हंसमुख थी। लेकिन आज ये उनका नया रूप देखा तूलिका ने।
तीनो डायनिंग टेबल से उठ गये थे। तूलिका ने खाना समेटकर किचन में रख दिया और अनामिका के कमरे में आ गयी। अनामिका बिस्तर पर लेटी रो रही थी। तूलिका चुपचाप अनामिका के पास बैठ गयी और उसका सिर गोद में रखकर धीरे धीरे बालों को सहलाने लगी। तभी अनामिका उससे चिपक गयी और फूट फूट कर रोने लगी। ऐसे जैसे एक बच्ची अपनी माँ की गोद में मुँह छिपाकर रोती है।
जो भी हुआ था तूलिका के सामने हुआ था इसलिए उसने अनामिका को रो लेने दिया। कुछ देर बाद जब अनामिका शान्त हुई तो तूलिका ने उससे बात करनी शुरू की। धीरे धीरे अनामिका उसे बताना शुरू किया,
“तूलिका! मुझे खुद नहीं मालूम मुझे क्या हो जाता है? छोटी छोटी बातों पर मुझे गुस्सा आने लगता है। मैं खुद को बहुत अकेला महसूस करती हूँ। रात को नींद भी नहीं आती।”
तूलिका बहुत ध्यान से सब सुन रही थी। अनामिका आगे बोली,
“तूलिका! मेरे मन में नकारात्मकता और हीन भावना आ गयी है। मैं अपने रिश्तों में जीना चाहती हूँ लेकिन कोई नहीं है मेरे आस पास।”
“अरे ऐसा क्यों सोच रही हो मम्मी? मैं बंटी और पापा तो हैं न आपके पास? आपके फेसबुक पर भी तो बहुत अच्छे अच्छे दोस्त हैं।”
“हाँ कभी थे। लेकिन अब सब अपनी दुनियाँ में मस्त हैं। मेरे लिए किसी के पास वक्त नहीं है। इसलिए अब मैं फेसबुक से दूर हो गयी हूँ।”
ये कहते कहते अनामिका की पलकें एक बार फिर नम हो गयीं।
“कोई बात नहीं मम्मी..अब मैं आ गयी हूँ, अब आप जितनी चाहे अपने मन की बातें मुझसे शेयर कर सकती हैं। अभी आप आराम करिये। शाम को हम सब माॅल चलेंगे।”
अनामिका ने हाँ मे सिर हिला दिया और सो गयी। शाम को सभी तैयार थे माॅल जाने के लिए। अनामिका गुलाबी साड़ी में बहुत सुन्दर लग रही थी। वो खुश थी उसे देखकर बंटी और तूलिका भी खुश थे।
रात को अनामिका ने ढेरों बातें तूलिका से की। अगले दिन सुबह तूलिका जल्दी उठ गयी और अनामिका को माॅर्निंग वाॅक पर ले गयी। पार्क का नजारा बहुत ही सुखद था। चारों तरफ अलसाए से फूल और उनके ऊपर ओस की नन्हीं नन्हीं बूँदें..ऐसा लग रहा था जैसे वो फूलों को जगाने आई हों। घास पर नमी की एक चादर बिछी थी। धीरे धीरे बहती हवा जब अनामिका के गालों से टकराई तो उसका अन्तर्मन पूरी तरह महक उठा। सूरज की लालिमा पूरे वातावरण को सुनहरा बना रही थी। चिड़ियों की चींची और कोयल की कूकू आपस में अंताक्षरी खेल रही थीं। अनामिका के लिए ये सब प्रकृति की ओर से वरदान था। वो अपने भीतर बहुत अच्छा महसूस कर रही थी।
तूलिका उसे अब रोज सुबह शाम वाॅक पर लाने लगी। वो हर समय अनामिका के साथ एक साये की तरह रहती। जैसे एक माँ अपनी बेटी के साथ रहती है। धीरे धीरे अनामिका खुश रहने लगी। 45 की उम्र में भी वो तूलिका के सामने एक बच्ची जैसी बन जाती। उसके मन में अब कोई ऐसी बात नहीं थी जो उसने तूलिका को न बताई हो।
आज अनामिका ने बहुत दिन बाद अपना मोबाइल उठाया और कुछ लिखा। बहुत दिनों बाद उसके दोस्त उसे देखकर बहुत खुश हुए। अनामिका ने तूलिका को थैंक्स बोलते हुए कहा,
“बेटी! अगर तू मेरे पास न होती तो, मैं शायद अंदर ही अंदर खत्म हो चुकी होती। तुमने ऐसे वक्त मुझे संभाला जब मुझे शायद एक माँ की जरूरत थी। एक माँ का फर्ज तूने निभाया। मुझे अपने अकेलेपन से लड़ने के लिए एक दोस्त की जरूरत थी और तुम मेरे अकेलेपन की साथी बनी।
“मम्मी! मैं कैसे भूल सकती हूँ कि जब मैं शारीरिक मानसिक रूप से न सही लेकिन प्राकृतिक रूप से माँ बन सकने के लिए होने वाले शारीरिक बदलाव के दौर से गुजर रही थी। उस वक्त एक माँ बनकर नहीं बल्कि एक दोस्त बनकर आपने मुझे संभाला था। महीने के उन दिनों जब दादी मुझे सबसे अलग थलग रहने के लिए कहतीं, तो आप मेरे लिए दादी से लड़ जातीं और मेरे साथ सोतीं। मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से संभालने वाली आप ही थीं। आप खुद दादी की रूढ़ियों का शिकार होती लेकिन मुझपर दादी की एक न चलने देतीं।
आज आप उम्र के उस दौर से गुजर रही हैं जहाँ प्रकृति आपके शरीर में ऐसी व्यवस्था कर रही है जिससे अब आपकी प्रजनन क्रियाशीलता समाप्त हो जाएगी।”
एक पल रुक कर तूलिका आगे बोली,
“प्रकृति भी कितनी अजीब है न मम्मी? कभी तो एक स्त्री के शरीर में एक बार माँ बन सकने की व्यवस्था करती है और दूसरी बार माँ न बन सकने की। और उम्र के इन दोनों पड़ावों पर जब स्त्री के शरीर में हार्मोनल चेंज होते हैं तब हर स्त्री को दूसरी स्त्री के ही सहारे की जरूरत होती है। चाहे वो माँ हो, एक बेटी हो या कोई दोस्त”..
अनामिका एकटक तूलिका को देख रही थी। सच ही तो कह रही थी तूलिका… कभी माँ बेटी को सहारा देती है और कभी एक बेटी अपनी माँ को…
इतने दिनों से तूलिका माँ बनकर अनामिका को संभाल रही थी। लेकिन आज एक बेटी(तूलिका) अपनी माँ की गोद में दुबकी हुई थी…
                      अल्का श्रीवास्तव

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