अपनी आँखों से देखा है कोरोना भयावह मंज़र- असली हीरो

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शहीद भगत सिंह सेवा दल के संस्थापक जितेंद्र सिंह शंटी कहते है ये है दिल्ली का असल हाल है, हो सकता है आपको कोई मीडिया न दिखाए। अपनी आँखों से देखिये अपनों की बर्बादी का ये मंज़र और कहने वाले कहते हैं की सब ठीक है। दिल रोता है शर्म नहीं आती इन सरकारी लोगों को, ये लोगों को ऑक्सीजन नहीं दे पा रहे। इलाज नहीं कर पा रहे। मेरी छाती फटने लगी है अब, यहां लाशों का अंबार लग रहा है। हालात नहीं बदले तो एक दो दिन में सीमापुरी का यह श्मशान छोटा पड़ने लगेगा।’
आपको बता दे यह अंतिम संस्कार सीमापुरी दिल्ली स्थित श्मशान घाट में शहीद भगत सिंह सेवा दल नाम की संस्था के तहत किए जा रहे हैं। जितेंद्र सिंह शंटी ने 1996 में यह संस्था शुरू की थी। शंटी 1996 से लावारिस लाशों का विधिवत अंतिम संस्कार करवाते रहे हैं। किसी गरीब परिवार को भी अगर अंतिम संस्कार में कुछ परेशानी आती है तो वे बिना किसी जाति-धर्म के भेदभाव के उसकी मदद करते हैं।
कोरोना संक्रिमतों के अंतिम संस्कार में मदद करवाने वाले शंटी बताते हैं कि मृतकों की अंतिम यात्रा के साथ दो-चार लोग ही होते हैं। कई बार तो कांधा देने के लिए भी चार लोग नहीं मिलते हैं।
शंटी कहते हैं कि ‘इतना भयावह मंजर मैंने कभी नहीं देखा। कैसा वक्त आ गया है। लोग अपनों के शवों को कोरोना के डर से नहीं छू तक रहे हैं। लाशों को चार कांधे भी नसीब नहीं हो रहे । एक दिन में ही बाप-बेटे का शव अंतिम संस्कार के लिए आ रहा है।’ और कहते हैं कि मैं मजबूत कलेजे वाला आदमी हूं, लेकिन मौजूदा हालात ने मुझे भी हिला कर रख दिया है। वे आंसू पोंछते हैं और फिर आ रही लाशों का अंतिम संस्कार करवाने के बंदोबस्त में जुट जाते हैं।
शंटी के मुताबिक, ‘दाह संस्कार के लिए आने वाले शवों का यह आंकड़ा 21 अप्रैल तक रोजाना 70 के करीब था। 23 अप्रैल को 93 शवों का अंतिम संस्कार किया गया था। लेकिन एक ही दिन के अंतर में यह आंकड़ा बढ़कर 120 पार कर गया। 24 अप्रैल को जिन लोगों का अंतिम संस्कार हुआ उनमें से महज 10 ही शव ऐसे थे, जो कोरोना संक्रमण की वजह से नहीं मरे थे, बाकी सभी लाशें कोरोना संक्रमितों की थीं। हालात यह हैं कि अब श्मशान घाट के पार्क में भी चिताएं जलानी पड़ रही हैं। अगर आगे हालात नहीं सुधरे तो सड़क पर भी अंतिम संस्कार करना पड़ेगा।’

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