दामाद

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श्री राजेश्वर शर्मा
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। ईश्वर की रचना में चौरासी लाख योनियों का वर्णन है परंतु उसमें केवल मनुष्य योनि ऐसी है जिसमें सैकड़ों की संख्या में विभिन्न रिश्ते जन्म से आरंभ होते हैं और इनकी संख्या उत्तरोत्तर बढती जाती है। यथा पैदा होते ही हमें माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी इत्यादि संबंध पैदा हो जाते है। जन्म के उपरांत विवाह एक ऐसा उत्सव है जो हमें एक बार फिर बहुत से नये संबंध एकाएक प्राप्त करता है यथा पति-पत्नि, पुत्रवधू, दामाद, सास-ससुर इत्यादि। जीवन में प्रत्येक संबंध का अलग एक महत्वपूर्ण स्थान होता है जो हमारे नीरस व अर्थहीन संबंधों में प्रेम के रंग और आत्मीयता का रस भरकर हमारे जीवन को एक नया आयाम देते है।
जीवन में हर संबंध महत्वपूर्ण है और उनका तुलनात्मक अध्ययन संभव नहीं है। हमारे ऋषि मुनियों तथा समाज के गणमान्य विद्वानों ने समय- समय पर संबंधों के महत्व पर विचार प्रकट किये हैं जिसमें माता-पिता, पुत्री, बहन आदि का बहुत विस्तृत व भावनात्मक वर्णन किया है परंतु एक ऐसा संबंध जो व्यक्तित्व रूप से हमारे जीवन व पारिवार के सौहार्दय का मुख्य स्तंभ है लगभग अछूता ही रह गया और उस पर बहुत कुछ नहीं लिखा गया। वह संबंध है ‘‘दामाद’’ का जिसको जामता, बटैऊ, पावना आदि अनेकों नामों से संबोधित किया जाता है। दामाद के परिवार में आगमन मात्र से परिवार के सभी सदस्यों में एक प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती है। साले-साली, सास, सलहज विशेषतौर पर हर्षित होते है। संबोधन सबसे सारगर्भित है जामा अर्थात वह पुत्र किसी माता कोई अन्य महिला होते है। अर्थात् दामाद वह पुत्र है जिसकी माता अन्य स्त्री अर्थात् हमारी लड़की की सास होती है।
दामाद सर्वोत्तम सम्माननीय संबंध है, उच्चतम आत्मीय संबंध है, पुत्र न होने की स्थिति में वह पुत्र का दायित्व निभाता है। परंतु मान-सम्मान प्रतिफल केवल इस कारण ही प्राप्त नहीं हो जाती कि वह हमारी पुत्री का वर है और विवाहोपरांत पति है और इस प्रतिष्ठा के लिए कुछ सामाजिक मान्यताओ व सतत् पालन करना होता है अन्यथा आज के परिवेश में हम देखते है कि शादी के उपरांत काफी मात्रा में आपसी मतभेद उजागर होने आरंभ हो जाते है और कुछ केसों में तो स्थिति तलाक तक पहुँच जाती है और सम्मानित संबंध कटुतापूर्ण संबंध में परिवर्तित हो जाता है और पारिवारिक हिंसा आरंभ हो जाती है अतः एक आदर्श दामाद के गुणों को रेखांकित करना आवश्यक है।
1. वैभवशाली पारिवारिक पृष्ठभूमि- किसी भी आदर्श दामाद का पहला गुण है कि उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, वैभवशाली, संस्कारी, आर्थिक रूप से संपन्न प्रतिष्ठित व गौरवमयी होना चाहिये प्रायःदेखने में भी आया है कि व्यक्ति में सर्वाधिक गुण परिवार से ही आते हैं।
2. गौरवशाली व्यक्तित्व- दामाद शारीरिक रूप से आकर्षण व्यक्तित्व का स्वामी होना चाहिये। निडर व पत्नी की रक्षा की क्षमता होनी चाहिये। उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली हो कि जब भी वह किसी सामाजिक व अन्य समारोहोें में सम्मिलित हो तो उसका उपस्थिति सभी में अलग ही दर्शनीय हो।
3. दामाद शिक्षित, सभ्य व शालीन होना चाहिये। बातचीत व शब्दों का चयन समयानुकूल करने की क्षमता होनी चाहिये तथा उसकी बातचीत में एक सम्मोहन होना चाहिये।
4. दामाद चाहे कितने भी संपन्न परिवार से जुड़ा हो या संपत्ति का मालिक हो उसमें अर्थ सर्जन करने की क्षमता होनी चाहिये जिससे विकट परिस्थितियों में पत्नी और परिवार को आर्थिक रूप से स्वावलंबी रख सके।
5. पत्नी के प्रति अर्थात् परिवार की पुत्री के प्रति उसका व्यवहार शालीन, सहयोगी, सलाहाकार व एक मित्र का होना चाहिए उसमें पत्नी को समझने व समझाने की योग्यता होनी चाहिये। उसका व्यवहार अपनी पत्नी व हमारी पुत्री के प्रति निरंकुश नहीं होना चाहिये। यदि कोई गलती भी होती है तो उसको आपसी परामर्श से हल करने की पहल कर सुलझाने की क्षमता होनी चाहिये।
6. आदर्श दामाद का एक गुण पत्नी को अपने परिवार यथा अपने माता-पिता या भाई-बहन के मध्य एक सेतु का होना चाहिये और उसका कर्तव्य है कि दोनों पक्षों में सामंजस्य व सद्भाव व मान-सम्मान कायम रहे। उसमें विरोधाभास की स्थिति में एक निर्णायक, निष्पक्ष मध्यस्थता होनी चाहिये।
7. ससुराल में आगमन पर उसे ज्ञात होना चाहिये कि वह वहाॅं का निरंकुश बेपरवाह, अमर्यादित अतिथि नहीं है अपितु एक सदस्य है ससुराल वाले उसके याचक नहीं है बल्कि कन्या के दाता है। भविष्य में उसे भी किसी का ससुर बनना है अतः व्यवहार प्रेमपूर्ण, मान-सम्मान व शालीनता से भरा होना चाहिये। यदि मान-सम्मान खाने-पीने में, सुख-सुविधा में यदि किसी से अज्ञानता कमी समझ स्वीकार कर नज़र अंदाज करने की क्षमता होनी चाहिये।
8. महिलाओं का सम्मान- दामाद को ससुराल में एक विशेष मान-सम्मान व प्यार मिलता है। विशेषतौर पर ससुराल की महिलाओं की तरफ से। उसमे इतनी शालीनता होनी चाहिये कि हास-परिहास को अन्यथा न ले, और रिश्तों की गरिमानुकूल व्यवहार करें, हास-परिहास का आनंद लें। अशोभनीय बातचीत से विरक्त रहे सभी को यथायोग्य सम्मान दें।
9. सभी ससुराल व उससे संबंधित व्यक्ति सदैव आदर्श नहीं होते और जाने-अनजाने स्वार्थपूर्ण, वैमनस्य व्यवहार भी संभव है। पत्नी के परिवार की गलतियों का उलाहना या कटाक्ष सदैव पत्नी को न दें। कोई लड़की कभी नहीं चाहती कि उसके परिवार में कोई गलत बात उसके पति या परिवार के प्रति हो परंतु निकृष्ट परिवार वाले अपनी लड़की की नहीं सुनते तो ससुराल का गुस्सा पत्नी या हमारी पुत्री पर न उतारें।
10. आदर्श दामाद के लिए ससुराल से लेन-देन कोई व्यापार नहीं है सदैव कोई एक पक्ष कम या अधिक संपन्न हो सकता है या अच्छी या बुरी आदत का हो सकता है अतः ससुराल के लेन-देन, उपहार आदि को आर्थिक रूप से न देखें और अपनी सामर्थ्य के अनुरूप व्यवहार रखें।

11. अंतिम अभिलाषा होती है कि दामाद में कोई व्यस्न यथा शराब सेवन, जुआ, गाली-गालौच पर स्त्री गमन, बेईमानी, हेरा-फेरी, दंगे, गुंडागर्दी, मारपीट जैसे दुःवयस्न न हों अन्यथा एक से दस तक के सब गुण भी व्यर्थ है जैसे दूध को नींबू की एक बूूॅंद भी फाड़ने को काफी है।

पिछले जन्मों के सुकर्मो, पराबद्ध, सतकर्मो से ही ऐसा दामाद मिलना स्वयं बनना संभव है क्योंकि हर ससुर कभी न कभी किसी का दामाद होता है। यही समाज की परंपरा है। हम सौभाग्यशाली है कि ईश्वर ने पहले तो हमें एक ऐसी कन्या दी जो सर्वगुण संपन्न है जिसका होना ही हमारा सौभाग्य है जिसके प्यार को शब्दों को समूह में बाॅंधना संभव नहीं है। सुंदर,सुशील, गृहकार्य दक्ष कन्या के पिता का मन सदैव सशंकित रहता है कि पता नहीं उसे किस प्रकार का पति ईश्वर ने निर्धारित किया और लड़की की शादी तक यह जिज्ञासा बढ़ती जाती है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि पुत्री व दामाद का संबंध जन्म जनमांतर एक दूसरे के लिए एक दूसरे व समाज के लिए आदर्श रहे। उनका जीवन आनंदपूर्ण, प्रेमपूर्वक व संपन्नता, सौहार्द्य व वैभवशाली दीर्घ आयुमय हो।

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