गुड़िया दामिनी निर्भया और प्रदुम्न को समर्पित…

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सोच रहा हूँ आज बस इतना सा

क्या कसूर उसका जो उड़ता यहाँ वहाँ नादान परिंदा है
क्योँ भेड़िये रूपी इंसान लूट गये बनकर उसे दरिंदा है

क्यों कानून की हजारों बाहें उसको बचा रही है आज
क्यों आत्मा को मारकर आज मानव यहां पर जिंदा है

क्यों सड़कों चौराहों स्कूलों पर मासूमियत लूट जाती
क्यों इज्जत लूटने वाले नहीं होते कभी भी शर्मिदा है

लगता है जोर जोर से चिल्लाऊं यहां पर मत आना
इस चील कौवों की बस्ती पर नेता तो करते बस निंदा है

न्याय नहीं दे पाते हम किसी को बस निंदा है बस निंदा है
और दिल रुआँसा मेरा आज यारों आत्मा मेरी शर्मिंदा है

अशोक सपड़ा की क़लम से दिल्ली से

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