दिसंबर का महीना

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वो अटके से ठहरे ठहरे से जज्बात,
लबो पे रूकते लफजों की बंदिश
दिल में खलिश सी तेरी मौजूदगी और…..
उफ!! ये दिसंबर का महीना।
कोहरे की चादर में लिपटे कुछ ख्याल
धुंध में धुंधलाता सर्द सा तेरा अक्स
बिछुङे को ढूंढता पागल दिल और…..
उफ!! ये दिसंबर का महीना।
वो कुनमुनी धूप में आंखो से झरते मोती
पलको के कोरो से समेटती कुछ आहें
बदन पे लपेटे तेरी खुश्बू का लिबास और…..
उफ!! ये दिसंबर का महीना।
तेरी यादों की वो जानलेवा अंगङाई
तुझे ही सोचना, लिखना और गुनगुनाना
चांदनी सी खिलती कमसिन हंसी और…..
उफ!! ये दिसंबर का महीना।
तेरा बातों बातों में आंचल की नरमी
कानों को छूकर निकलता रूहानी स्पर्श
रंगीन हो जाते स्हायी के स्याह रंग और
उफ!! ये दिसंबर का महीना।
तेरी निगाहों की मीठी सी शरारत
मेरे चेहरे से उलझती जाती सी नजर
फिर तेरा नेह बनकर यूं बरसना और…..
उफ!! ये दिसंबर का महीना।
तेरा शाम का सूरज बन ढल जाना
मेरा शबभर यूं भटकना सेहराओं में,

फिर जिस्म तेरी छुअन से जल उठे और…..
उफ!! ये दिसंबर का महीना।
वो बर्फ सी जम जम जाती सांसे
पिघलती सी ठहरी ठहरी शमा सी मैं
कंपकपाता, ठिठुरता सा रोम रोम और
उफ!! ये दिसंबर का महीना।
तेरी चाहतों का ओढ कर आसमान,
अपने अरमानों का सुलगा कर अलाव,
सैंक लू वेणी में गूथीं हुई कुछ उम्मीदें और…..
उफ!! ये दिसंबर का महीना।
निषा माथुर

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