दीप- वंदना

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दीप जले,
उजास पले !

आशाएं प्रमुदित
विश्वास विहँसते
तम रोशनियों के
जाल फँसते

निराशाएं अब तो
निज कर मले !

आत्मबल की जय
सफलताओं के दिन
हीनता का पराभव
साहस की धुन

क्षय अब और
क्योंकर छले ?

मातम के दिवस
बीते
शोक के घट
रीते

सुधियों के दर्पण
लगते भले !

सरगम बजती
पल अलबेले
मौसम ने उमंग के
खेल खेले

शुभ- मंगलमय
कमल खिले !
— प्रो.शरद नारायण खरे

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