पुस्तक समीक्षा : दीपिका एक कशिश

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समीक्षक : अवधेश कुमार ‘अवध’

रचनाकार – श्रीमती दीपिका सुतोदिया ‘सखी’
संस्करण – प्रथम
प्रकाशन – सरस सखी प्रकाशन
मूल्य – रुपये 150/- मात्र

‘दीपिका एक कशिश’ श्रीमती दीपिका सुतोदिया ‘सखी’ की प्रौढ़ता की ओर उन्मुख लेखनी द्वारा उर्वर काव्यमयी उपज है । आकर्षक मुख पृष्ठ से सजी तकरीबन एक सौ रचनाओं को एक सौ बारह पृष्ठों में समाहित करती यह पुस्तक पूज्य माता स्व० तारावती बाँसल को समर्पित है जिसकी शुरुआत ‘हम प्यार के राही हैं, मंजिल पर रुकेंगे’ के साथ लोक मंगल की भावनाओं के पूर्ण समर्पण की अभिव्यक्ति है । पाठकों से कवयित्री का परिचय कवि एवं समीक्षक श्री अवधेश कुमार ‘अवध’ के शब्दों में –

‘जय हिन्दी, जय हिन्द यशस्वी, हिन्दी के उन्नायक जय हो ।
कण – कण हो जाए हिन्दीमय, ‘अवध’ ‘सखी’ संकल्प हमारा ।।’

कवयित्री को साहित्य रूपी राधिका की संज्ञा देते हुए लेखनीकार आनन्द ‘अमित’ जी के उद्गार –
‘दीपिका एक कशिश की प्रत्येक रचनाओं में एक कशिश है जो सभी पाठकों को बाँधे रखती है ।’ शुभकामना देते हुए डॉ. प्रभु चौधरी कहते हैं कि, ‘इस पुस्तक में प्रकाशित कविताओं में यथार्थ का धरातल, सत्यता की कसौटी पर जड़ा गया है ।’ स्वयं कवयित्री की स्वीकारोक्ति – ‘सभी विषयों पर लिखना मुझे भाता है, जो देखती हूँ, महसूस करती हूँ, वही लिख पाती हूँ ।’

खुरदुरे धरातल के कठोर अनुभवों को व्यक्त करते हुए ग़ज़लकारा कहती है –
‘ज़ख़्म खाये हैं दीपिका ऐसे, दर्द होता है मुस्कुराने में ।।’

सकारात्मक सोच, सहयोग की भावना और दृढ़ संकल्प से सराबोर करती कुछ पंक्तियाँ देख सकते हैं –

‘इक दो से क्या, ये सारे जमाने से पूछ लो ।
दामन पकड़ लिया तो, छुड़ाया न जाएगा ।।’
× × × × × × × × × × ×
‘अपनों को रौंदकर बढ़ने वाले मिलते तो हैं बहुत ।
पकड़कर उंगलियाँ बेशक कारवाँ बनाऊंगी मैं ।।’

कवयित्री ग़ज़ल की रुहानी दुनिया में अपनी हाज़िरी दर्ज कराने के बाद गीत के द्वारा माँ कामाख्या देवी को याद करती है । परिवर्तन का स्वागत ‘हौले – हौले’ करती है किन्तु हिन्दुस्तान के बदले रूप के प्रति मन में असंतोष एवं दु:ख है ।

‘सच तो है’ कविता में असफलता से निराश न होकर हिम्मत रखने हेतु आह्वान है –
‘क्या हुआ /जो न पूरा हुआ / अपना सपना
हताश ना हो /सूरज हर रात के बाद / फिर आता है ।’

श्रम संसाधन के रूप में जी तोड़ मेहनत करने वाले श्रमिकों के श्रम और लघुतर श्रमफल दिल को झकझोर देता है-
‘भव्य भवनों, इमारतों को बनाने वाले
नहीं बना पाते अपने लिए छत को ।’

‘माँ’ में ईश्वर को देखते हुए संचय और मोह के विरुद्ध लेखनी की धार दृष्टव्य है –
‘जीने के लिए जितना जरूरी है, उतना ही खाओ ।
मत अपने स्वार्थ के लिए अपने देश को बलि चढ़ाओ ।।’

नशा समाज जी एक प्रमुख समस्या है जिससे आगाह करती हुई लेखनी गरज उठी –
‘कहे दीपिका बात पते की, माटी में मिल जाओगे ।
नशे के कुएँ से जो निकलोगे तो, उज्ज्वल भविष्य पाओगे ।।’

क्षणिकायें, मुक्तक, वर्ण पिरामिड और दाहे भी स्तरीय हैं । इस गुलदस्ते में ग़ज़ल, गीत, कविता वार्णिक एवं मात्रिक छंदों का रसास्वादन किया जा सकता है । ग़ज़ल में ग़ज़लकारा कुछ कमजोर सी है और गीत में पाँव जमाने के लिए लालायित है । यद्यपि छंदों में भाव और शिल्प में लुका – छुपी का अनुभव होता है तथापि कविताओं में लेखनी पूर्ण यौवन पर है । यदा – कदा मामूली टंकण दोष परिलक्षित है । काव्य में अंकों एवं संक्षिप्त शब्दों का प्रयोग परिपक्वता पर सवाल खड़े करता है ।

साहित्य प्रेमियों ने दिल खोलकर शुभकामनाओं से दीपिका एक कशिश को आशीर्वाद और प्यार दिया है । सलीम तन्हा, कमल तोदी, सन्दीप कुमार ‘अजनबी’, मंजूर नदीम ‘बालापुरी’, बासुदेव अग्रवाल, रामू भैया, आनन्द ‘अमित’ और ब्रह्मनन्द अवधूत जी के स्नेहाशीष से अभिसिंचित किया है । प्रथम पंक्ति से अंतिम पंक्ति तक दीपिका का कशिश नयनाभिराम है ।

समीक्षक : अवधेश कुमार ‘अवध’

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