दीवार में आले – मेरी नज़र में…

0
120

20431465_1348982881867045_984911900567040471_n
सृजनधर्मिता के पर लगा कर साहित्याकाश में अबाध गति से अनवरत उड़ान भर रहे साहित्यानुरागी , मनीषी , शब्दों के कुशल चितेरे श्री रामकिशोर जी उपाध्याय साहित्य जगत में देदीप्यमान सितारे की तरह अपनी रचनाओं के प्रकाश से साहित्य जगत को निरंतर प्रकाशित ,प्रभासित , आलोकित , आभासित कर रहे हैं l 20663712_1358445954254071_267394641594407774_n
वैसे तो श्री रामकिशोर जी उपाध्याय गीत , ग़ज़ल ,छंदादि विभिन्न विधाओं में सृजन करते हैं किन्तु छंद मुक्त रचना – कर्म में आप विशेष रुचिशील हैं , लोकार्पित पुस्तक ” दीवार में आले ” आपकी छंद मुक्त काव्य की तृतीय अनुपम , अप्रतिम कृति है …इस पुस्तक के लोकार्पण के सुअवसर पर श्री रामकिशोर जी उपाध्याय को हार्दिक बधाई एवं अनेकानेक शुभकामनाएं और मुझे इस भव्य आयोजन का साक्षी बनने एवं कृति पर अपने विचार रखने का सुअवसर प्रदान करने के लिए हृदय के￰ गहनतल से आपका आभाराभिव्यक्त करती हूँ l

सृजनधर्मिता की पृष्ठभूमि में सृजनकर्ता का स्वभाव , कर्म , गुण , उसका चिंतन – मनन ,अनुभव – अनुभूतियाँ , समसामयिक परिस्थियाँ सदैव प्रभावी रहते हैं ,जो रचनाधर्मी की रचनाओं में स्पष्टरूप से परिलक्षित होते हैं , दृष्टिगत होते हैं एवं प्रभावी होते हैं l
श्री रामकिशोर जी की रचनाओं में प्रतीकों का बाहुल्य एवं सशक्त अभिव्यंजना रचनाओं को विशिष्टता के पायदानों पर सुस्थापित करते है l निहितार्थों को समाहित किये हुवे आपकी रचनाएँ सरल , सरस और बोधगम्य हैं l आपकी रचनाओं मे प्रवहमानता एवं लयात्मकता रचनाओं को माधुर्य से मधुरिम एवं सरसता से सरसित एवं रसवंत करतीं हैं l
लोकार्पित पुस्तक ” दीवार में आले ” छन्द के नियमों यथा तुक , यति मात्रादि के बंधन से सर्वथा मुक्त है l आपकी कविताओं में कहीं संवेदनाओं के ज्वार की गर्जना है तो कहीं आप प्रेम – पाथेय – पथिक के मनोभावों को अपनी तूलिका से उकेरने की भूमिका का कुशल निर्वहन करते हैं l
जाति , धर्म मजहब की बातें और अपनत्व के अहसास के भ्रम पर कवि कहते हैं ….
लोग मुझसे मज़हब पूछते
औरअपना कहते
लोग मेरी जाति पूछते
और अपना समझने का भ्रम पालते
मिट्टी से निकला मिटटी का कमाल

आज इंसान से इंसानियत के कोसों दूर होने और सत्ता लोलुप लोगों से देश के हिताहितों की अनदेखी से व्यथित कवि श्री उपाध्याय उसे जमीन पर तलाशने की बात यूँ कहते हैं …
आकाश में अब रोज खिलता है इंसानियत का सुमन
जो ढूंढता है ज़मीन पर अपनी जड़ें
और ख़्यालों में वतन

आर्थिक विपन्नता से त्रस्त -संत्रस्त लोगों की वेदना से भीअनभिज्ञ नहीं है कवि उपाध्याय , झिड़की – ताने डाट – फटकार तो जैसे गरीब की नियति है जिसका उसे विरोध किये बिना सहज स्वीकार कर लेना है कवि श्री रामकिशोर यूँ अभिव्यक्त करते हैं उनके इस यथार्थ को …….
कल धन्नों की साड़ी फट गई
गाय की बछिया मर गई
एक बीघा में जो थी फसल
वह भी इस बरसात में मर गई
और नौकर भये
तो साहेब से उधार मांगने पर डाट पड़ गई
कौनअब बुरा माने और किसका करे मलाल रे …

श्री रामकिशोर जी उपाध्याय की कविताओं में दृष्टिकोण एवं चिंतन की व्यापकता का आकाश है .. हस्ताक्षर के साथ लगी डॉट ..एक बहुत छोटी सी बिंदु भी उनके दृष्टिपटल से गुज़र कर मन – मानस के द्वार को खटखटाती है तब जन्म ले लेती है एक कविता और कवि की लेखनी श्रृंगारित कर देती है उसे अनेकों प्रतिमानों से ..देखिये कवि के चिन्तन की व्यापकता ……
तुम्हारे हस्ताक्षर के नीचे /सामने / ऊपर लगी होती है
एक बिंदी (डॉट)
जोअनायास तुमसे लग जाती है
जैसे
पेड़ पर फूल
कान में बालियां
रात में ओस
नाक में मोती
सांझ में दीप

वहाँ भी स्वयं के होने के अहसास को यूँ कहते हैं कवि ……

जानते हो वो कोई और नहीं
मैं ही तो हूँ
तुम्हारे जीवन हस्ताक्षर के संग
मूक और शाश्वत

मनुष्य नित्य प्रति प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहा है, वृक्ष काट दिए जाते हैं , नदियों को बाँध दिया जाता है ,नाले पाट दिए जाते हैं , खेत – खलिहान नष्ट कर दिए जाते हैं तब प्रकृति के नष्ट किये जाने की वेदना के स्वर मुखरित हुवे हैं एक ओर , तो वहीं प्रगति और विकास के नाम पर विनाशोन्मुख होने की पीड़ा और चेतावनी भी अभिव्यक्त हुई है कवि की लेखनी से ..”मैं प्रकृति हूँ” कविता में.
कहीं जन – गण – मन – मानस की वेदना ने उद्वेलित किया है कवि को तो कहीं विपन्न और अभाव ग्रस्त जीवनयापन कर रहे लोगों की अंतर्वेदना ने झकझोरा है कवि की सहृदयता को l कहीं प्रेम की वेदना तो कभी उत्स के पलों की गलियों से गुज़रा है कवि , तो कहीं कर्म पथ पर अनवरत चलने के लिए प्रेरित भी करता है , अपनी कविता लक्ष्य से पहले के माध्यम से l
यही नहीं कवि श्री रामकिशोर को देश की सामाजिक , राजनैतिक , आर्थिक विषम परिस्थितियां भी विचलित करतीं हैं l
हमारादेश आज़ाद तो हो गया किन्तु सुनहरे भारत के जो सुनहरे स्वप्न देखे थे हमने वे अभी तक पूर्ण नहीं हुवे …आज भी भूख , ग़रीबी, बेबसी , लाचारगी , विद्रूपताओं और वैषम्य से जूझ रहा है देश हमारा , स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग 70 वर्षों बाद भी परतंत्रता की मानसिकता से न उबरने से व्यथित कवि की व्यथा अभिव्यक्त होती है …..
“,कल के प्रश्न आज भी हैं ” और “ईश्वर तू कहीं है भी ,” कविता मेंl देखिये ईश्वर तू कहीं है भी कविता में..कवि कहते हैं ……
वही है धूप
वही है छाँव
लंगड़ी टांग
वही है नंगा बदन
वही है भूख
वही है प्यास
वही है निजाम
वही तो है इंतज़ाम भी
अगर कुछ बदला है तो
सिर्फ़ हुकूमत करने का रंग ढंग
और उसे सही साबित करने के तर्क
वही तर्क–
जो कल तक गरीब के उधड़े बदन पर
कौड़े बनकर बरसते थे
हारे का हरिनाम ..
ईश्वर तू कहीं है भी …………..?

परन्तु आप परिस्थितियों के परिवर्तन के लिए आशान्वित भी हैं उनकी रचना में आस्था के स्वर भी मुखरित हुवे हैं l

बचपन बहुत प्यारा होता है , नटखट होता है , बेफिक्र और सहज होता है , खेलकूद और शरारत भरे उन्हीं दिनों की यादों को दिलो – दिमाग में सहेजे कवि पुनः उसी बचपन की ओर जाने की कामना करते हैं अपनी कविता ” कामना ” में l

एक बहुत सुंदर भावों से सुसज्जित रचना देखिये ….
दर्द में बिल्कुल न झुके
आस में तन कर खड़े
विश्वास में चुप चुप दिखे
क्या तुम कभी पिता थे
पिता के आत्मविश्वासी , तटस्थ , एवं मुसीबतों से जूझने की सामर्थ्य को बहुत ही सुंदरता से अभिव्यक्त किया है , श्री रामकिशोर उपाध्याय ने ….
वहीं माँ का प्यार ,धैर्य , कोमलता ममता और वात्सलयपूर्ण स्वरुप को यूँ अभिव्यक्ति दी है…….
भार से झुक कर चले
धैर्य में डट कर खड़े
प्यार में पल पल बहे
क्या तुम कभी माँ थे

आदमी की ढिंढोरे पीटने की प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं कवि रामकिशोर शंख के माध्यम से कहते हैं आदमी तो ढपोर शंख है और शंख बजता है देवों के आह्वान के लिए , मंगल के लिए , शिवम् के लिए ….” शंख ” नामक कविता में ल

और जिस कविता ने पुस्तक को नाम दिया , पहचान दी , आवरण पृष्ठ को सुसज्जित किया ” दीवार में आले ” लघु किन्तु गहन भावों का पुञ्ज है ….
भुरभुरी यादों की
चिकनी दोमट मिट्टी से
खुद ही दीपक बनाकर
अपनीआँखों की ज्योति से
अपनी निद्रा के घी से
हर रोज रात में आलों को
प्रकाशित करता
काश ! मेरे घर की दीवारों में आले होते

श्री रामकिशोर उपाध्याय की रचनाएँ प्रतीकों के वटवृक्ष की टहनियों पर प्रस्फुटित ,पल्ल्वित और पुष्पित हुई हैं l इनकी कविताओं में भावों की गहनता का अथाह समन्दर है , कल्पना और चिंतन का विस्तृत आकाश है , आपके पास शब्दों का अक्षय कोष है , अभिव्यंजनात्मक अभिव्यक्ति का प्राबल्य एवं अदम्य प्रभावोत्पादकता है , नदियों की लहरों सी प्रवहमानता एवं लयात्मकता है l

आपकी रचनाओं के पुष्पगुच्छों की महक पाठकों के हृदयांगन को महकाता रहे , सुरभित करता रहे ,
माँ शारदे का वरद हस्त सदैव आपके शीश पर रहे.आप अनवरत साहित्याराधन करते हुवे उत्कर्षोन्मुख हों …इन्हीं शुभकामनाओं के साथ अपनी वाणी को विराम देते हुवे अपना स्थान ग्रहण करती हूँ l पुनश्च श्री रामकिशोर जी को अनंत शुभकामनाएं एवं आभार
आप सभी सुधीजनों ने मुझे धैर्यपूर्वक सुना , एतदर्थ मैं आप सभी प्रबुद्ध साहित्यकार बंधुओं एवं बहनों की हृदय के गहनतल से आभारी हूँ l
धन्यवाद l

  प्रमिलाआर्य

LEAVE A REPLY