दीया बन जायें

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डाॅ0 अशोक पण्ड्या
भारत सांस्कृतिक सद्भाव का वैष्विक मीलस्तंभ है ।  परस्पर प्रेम और अपने में समाने की शक्ति भारतीय स्वभाव है ।  वस्तुतः यही समृद्धि का मूल स्वरूप है ।  सामथ्र्य भी इसे ही कहते हैं ।    दिवाली इसी समृद्धि और
सामथ्र्य का प्रतीक पर्व है ।  यह आज भी नूतन, प्रासंगिक और अनुकरणीय मानवता का अमृतोत्सव ही है ।  आइये, अपने आपको दीपक बनाएं, जलाएं और औरों के लिये प्रकाश बिखेरें ।
एक से अनेक की ओर प्रयास समृद्धि का सोपान है तो दीपक इसका पर्याय । वस्तुतः ’स्व’ तत्व जलाकर आत्म प्रकाश की उत्पत्ति ही दिवाली का हेतु है ।  समृद्धि का गर्भ तो सुख का अंकुर भी यही है ।  यही कारण है दिवाली आज भी प्रासंगिक है । तिमिर अटल जैविक सत्य है ।  यह विविध ही नहीं असंख्य बहुरूप है।  दुःख इसका सांकेतिक नाम है ।  इसी दुःख द्रव्य को जला प्रकाश उत्पन्न करना दिवाली है, तभी तो यह प्रकाश पर्व भी है ।  चूंकि प्रकाश की एक चिनकारी भी अंधकार को नष्ट कर सकती है, दिवाली तो ऐसी अनेक चिनकारियों और किरणों का समुच्चय है, अंधकार दुम दबाकर भाग जाना ही श्रेयस्कर समझता है । परिणाम में प्रकाश ही प्रकाश पथराता है, यही दिवाली है ।
इसमें संशय नहीं कि आर्थिक प्रगति समृद्धि का मूलाधार है तथापि यही अंतिम लक्ष्य हो, इसमें मेरी सहमति नहीं है ।  दुर्भाग्य से आज हम इसे ही समृद्धि मान बैठे हैं ।  एक दूसरे के उत्थान को भूल अपनी ही भूलभूलैया का खेल न अच्छा था, न है, न ही होगा ।  भारतीय मानस इसे स्वीकार नहीं कर सकता ।  इसीलिये ये त्यौहार हमारी सांस्कृतिक धरोहर है ।  ये संदेश देते  हैं कि ’मेरे में’ और ’तुम में’ नहीं सही समृद्धि तो ’हम’ में निहित है ।  इसी ’हम’ भाव ने भारत को लोकतंत्र का दर्जा दिलाया है तथापि हम भटकते नजर आ रहे हैं ।  यह प्रकाश नहीं, अंधकार है ।
दिवाली की ओर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि यह सभी के घर समान रूप से आती है, न अमीरी देखती है न गरीबी, न ऊॅंच न नीच, न राजा न प्रजा । दिपावली हर एक को प्रसन्नता का उपहार प्रदान करती है ।  दिवाली अपने प्रकाश से सभी को अपना अपना क्षितिज दिखाती भी है और उससे मिलवाती भी है ।  यही इसकी विषेषता है, जो दूसरे पर्वों से इसे पृथक् परिभाषित करती है।  निर्धनतम व्यक्ति भी महालक्ष्मी के चरण पखारता है तो अंबानी सा व्यवसायी भी ।  इसमें आर्थिक वैविध्य अवष्य नजर आ सकता है लेकिन भावमाधुर्य में लेशमात्र भी अंतर नज़र नहीं आता ।  तभी यह दिवाली है ।
दिवाली मिठाइयों और मिठाई में फर्क नहीं करती, अनेक पकवान भी मीठास ही प्रदान करते हैं तो गुड़ का एक ढ़ेला भी उतना ही मीठा लगता है ।  तभी तो दिवाली दिवालियों की भी उतनी ही है जितनी कुबेरों की ।  वस्तु व्यंजनों में नहीं, मनाने के भाव में ही मिठास की अनुभूति है ।  यही भारतीय दिवाली है, जो आर्थिक असमानता को भी सोहार्द के भाव से पाट देती है ।
यह बात अलग है कि समय ने प्रकाश को भी पीला बना दिया है ।  निरंकुशता और स्वच्छंदता इसके मूलक हैं ।  मिठाई में मिलावट, पटाखों का दुरूपयोग, प्रसन्नता का शोर और उसकी कर्कशता, धन का मकडजाल और परस्पर विभेद ने वर्तमान पर वज्रपात किया है ।  राजनीति और सामाजिक रूग्णता ने भी दिवाली के दियों से तेल लील लिया है तो प्रतिस्पद्र्धा प्रतिद्वंदता में परिवर्तित हो गई है !
यह प्रवर्त समृद्धि का लिबास है ।  इसे पहन और इसके सहारे हम सद्भाव की सीढ़ी नहीं चढ़ सकते और मानवीय आकाश की ऊॅंचाईयां नहीं छू सकते।  इसके लिये तो सौहार्द की सीढी ही एक मात्र विकल्प है, जो दिवाली को दिवाली बने रहने देने में ही निहित है ।
क्या यह आष्चर्य नहीं कि हम प्रसन्नता को आंकने-देखने का तरीका ही भूल गये हैं !  आनन्द और उत्साह का भी गला घोंट रहे हैं ।  कल की ही बात लें तो अमृतसर का दशहरा दश।नन को नहीं हरा पाया ।  अनुश।सन की अवमानना ने रेल की पहियों में रक्त पोत दिया ।  क्या आनन्द अन्धे होने का नाम है !
न्यायालय को यह निर्णय लेते सोचना पडे कि पटाखों पर पाबन्दी लगाना आवष्यक है, तो यह भी हमारी निरंकुशता ही परिणाम है ।  पोटाश से प्रकाश और आनन्द को उत्पन्न करने के गुण को हमने विध्वंस कर खिलौना बना दिया तो इसका यह हश्र तो होना ही था ।
यह भी दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि सरकारें भी संसद और विधान सभाओं में तो तमाशबीन बनी रहती है और सामान्य सोती रहती हैं और हादसों के बाद टूटे सपने की तरह ऊंघती आंखों से हड़बड़ी में ऐसे निर्णय लेती रहती है ।  समय पर जागना तो हम जैसे भूल ही गये हैं ।
इधर हम (आमजन) भी दिवाली पर तो ऊंघते रहते हैं और चुनावों में जागने का अभ्यास करते हैं ।  जीत पर ढोल, नगाडे आतिशबाजी कर सारे उत्सव एक साथ मना लेते हैं और सफेद कपड़ों के राक्षस को भगवान् बना देते हैं और फिर पांच साल के लिये सो जाते हैं ।
’वे खराब और ये अच्छे’ के भ्रम में जीता भारत दिवाली तो मनाता ही नहीं है ।  उसे तो बस होली जलाना ही आता है ।  न एक दीपक जलाते हैं, न ही जलाने देते हैं हम ।  हम तो बस बारूद की तरह स्वयं फटते हैं और औरों को भी जला देते हैं ।  यह हमारा मूल स्वरूप है ।  इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है,  तथापि जागने का आग्रह करता हूं और दीपक की तरह जलने और प्रकाश देने की कामना करता हूं ।  यही अभीष्ट है ।
क्षमा मांगते हुए यहीं विराम किंतु निराश भी नहीं हूं ।  इसी तेल से दीया जलाऊंगा और प्रकाश भी बिखेरूंगा – की अभिकामना के साथ आप सभी का दिपावली अभिनन्दन:

चलो दिवाली मनाएं ।
दीपक की तरह जलें,
उसी की तरह रोशनी भी दें ।
खांड़ की तरह गलें
और मिठाई की तरह बंटें ।

उमा पैलेस, खोड़न 327022

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