दोहे-डॉ.गोपाल ‘राजगोपाल’

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1.
अंकुश पर अपराध के,नये चाहिये दाव।   16387311_1426461514091232_1671169424789813116_n
डी.डी.टी.छिड़काव से,मच्छर खाते भाव।।
2.
सरमाया सौ साल का,लेकर आये साथ।
इक पल में जाया किया,बिना बात ही बात।।
3.
नहीं जरुरी मॉल में,मोल-भाव का काम।
ऑडर दो-सामान लो,करके चुकता दाम।।
4.
घंटों तक बैठक हुई,तब निकला ये सार।
होगी तय तारीख को,बैठक अगली बार।।
5.
पिंजरे से बाहर किया,पंखों से आजाद।
पंछी तुझे उड़ान की,ढेर मुबारकबाद।।
6.
क्यों कातिल की खोज में,दुबले होते आप।
कर ली होगी खुदकुशी,मैंने ही चुपचाप।।
7.
ना दूंगा इक बून्द भी,सावन बना लठैत।
प्लोट काट बिक्री किये,कृषक तुमने खेत।।
8.
सदियां लांघी वक्त की,रहा मगर अफसोस।
इन्सानों के बीच की,दूरी लाखों कोस।।
9.
हत्या कर दी पीट कर,बिना किसी हथियार।
तलवारों से तेज है,सौ हाथों की धार।।
10.
दो पंछी दो जात के,प्रेम करे चुपचाप।
दोनों के है बीच में,लेकिन बैठी खाप।।
डॉ.गोपाल ‘राजगोपाल’
आचार्य
सामुदायिक चिकित्सा विभाग
र ना टै मेडिकल कॉलेज एवं संलग्न अस्पताल,
उदयपुर

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