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न के लिए अभिभावकों से मिलना और उनके सवालों के उत्तर देने के कार्य करने होते हैं जबकि सरकारी स्कूलों में आज भी जनगणना, चुनाव, पोलियो ड्राप पिलाने, पोशाक एवं छात्रवृति वितरण जैसे कार्यों में लगाया जा रहा है। अनेक बड़े सरकारी आयोजन इन्हीं शिक्षकों की तैनाती पर सफल होते हैं। सीबीएसई ने इस साल भी निर्देश जारी कर संबद्ध विद्यालयों को कहा है कि वे शिक्षकों पर ऐसे कार्यों का बोझ नहीं डालें, जो शिक्षा से जुड़े हुए नहीं हैं, लेकिन सरकार की कथनी और करनी में अन्तर यहीं देखा जा सकता है। स्कूलों का इंफ्रास्ट्रक्चर प्रायः नदारद है, और जहां है भी वहां कम से कम राज्य बोर्डों से पढ़ाई करने की कोई वजह बच्चों के पास नहीं बची है। सरकार पूरे देश में एक कर प्रणाली के लिए जैसी गंभीरता जीएसटी को लेकर दिखा रही है, वही गंभीरता उसे देश में एक शिक्षा प्रणाली लागू करने को लेकर भी दिखानी चाहिए।
दुनिया भर में छात्र कैसे सीखते हैं और कैसे पढ़ते हंै, यह एक बड़ा विषय है। शिक्षक ब्लैकबोर्ड पर चॉक से लिखते हैं, लेकिन इसके बावजूद कक्षाओं में स्थान के साथ अंतर दिखता है। कुछ जगह नन्हे छात्र बाहर कामचलाउ बेंचों पर बैठते हैं, तो कहीं जमीन पर पद्मासन की मुद्रा में और कुछ ऐसे स्थान हैं जहां लैपटॉप के सामने बच्चे पढ़ते हैं। बड़ा फासला है सुविधाओं एवं साधनों को लेकर। दुनिया के शीर्ष 100 उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में भारत के शीर्ष कालेजों एवं विश्वविद्यालयों का स्थान नहीं होने का मुद्दा कई सालों से चिंता के विषयों में शामिल रहा है। लेकिन इससे भी बड़ा मुद्दा है भारत की प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा का एक सार्थक दिशा में अग्रसर न होना। जब तब य

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