गजले- केशव शरण

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वेदना के बोल समझेंगे नहीं
आंसुओं का मोल समझेंगे नहीं
जानते हैं सिर्फ़ दुनियादारियां
भावना का रोल समझेंगे नहीं
वाद्य- गुण की खाल से हैं ढंक दिये
सोचते हैं पोल समझेंगे नहीं
खींचते लम्बी बहस को मानके
मामला है गोल समझेंगे नहीं
ख़ूबसरत शिल्प सुन्दर शब्द हों
क्या कहां है झोल समझेंगे नहीं
अमरितों में घोलते विष फेंटकर
घोल अंदर घोल समझेंगे नहीं
खुल गया भी लोक में इक आवरण
खोल ऊपर खोल समझेंगे नहीं
माप क्या होता वफ़ा का मत कहो
प्यार का क्या तोल समझेंगे नहीं
केशव शरण

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