मुनियों फ़क़ीरों की धरा , तस्वीर जग से प्यार की

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shivansh
मुनियों फ़क़ीरों की धरा , तस्वीर जग से प्यार की
तपभूमि भारत वर्ष है , सम्पूर्ण इस संसार की
पाषाण पुलकित हो उठे, ह्रदय करे अब नृत्य रे
गाए भजन मीरा यहाँ जब कृष्ण के अनुराग में
बस प्रेम ही बरसे यहाँ आकाश से ले भूमि तक
सुमिरन करे वसुधा यहाँ रस मग्न हो कर फाग में
कण-कण घुमड़ कर गा रहा है प्रेम ही बस प्रेम ही
कोई जगह मिलती नहीं हैं फिर यहाँ पर रार की
कुछ त्याग कर सब मोह-माया योग कर त्यागी बने
खोजा उन्होंने आत्मा को गेह में ही अंत तक
कुछ लोग हैं जो वेद पढ़कर साधना में लीन हैं
कुछ लोग जो उसकी लगन लेकर गए हैं संत तक
कोई जपे अन्दर उसे बाहर जपे कोई उसे
कोई करे है भक्ति निर्गुण या सगुण साकार की
विधु,सूर्य कह उट्ठे,सुभूषित भूमि भारत की रहे
हर उपनिषद हर वेद में जिसके मिले दर्शन कथा
है मुक्तिकामी जल यहाँ जो मोक्ष का ही स्वाद दे
गंगा मथे अमृत यहाँ , कण कण यहाँ अमृत मथा
गीता यहाँ दर्शन यहाँ, गंगा यहाँ अमृत यहाँ
तुमको सुनाऊ क्या भला इसकी कथा उद्धार की
शिवांश भारद्वाज

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