गुरु -अध्यापक  

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– श्री राजेश्वर शर्मा
समाज में हम सब जब रक्त संबंध सामाजिक संबंध मित्र, पड़ोसी व सहकर्मी के अतिरिक्त सवार्धिक महत्वपूर्ण संबंध को याद करते हैं तो हमारे हृदय में अकस्मात् हमारे सामने हमारे गुरु -अध्यापक की छवि ही आती है। जीवन में हमें बहुत से व्यक्ति गुरु के रुप में मिलते हैं प्रारंभिक शिक्षा से स्नातोकर व उच्च शिक्षा तक अधिकांश अध्यापकों की छवि तो दूर नाम भी याद नहीं आता परंतु कुछ जीवन पर्यन्त हमारे हृदय में आदरणीय स्थान गृहण करे रखते हैं। प्रश्न है कि वो क्या अंतर है जो कि अध्यापक को साधारण और किसी को असाधारण बना देते है। इस पर विचार करना भावी पीढ़ी के मार्गदर्शन को आवश्यक है।
‘‘गुरु’’ का अर्थ है गुरु सिखाने वाला और मुक्ति मार्ग सिखाने वाला। एक साधारण पत्थर को तराश कर मूर्ति बनाने वाला, शब्दावली के साधारण शब्दों से महाकाव्य लिखने वाला, पर्वत शिखर से ज्ञान की गंगा प्रवाहित करने वाला, आकाश की अनंत ऊंचाइयों तक हमें कल्पनाओं को साकार कराने वाला, शब्दों के वाक्य से,
उसका वर्णन संभव नहीं हैं परंतु एक सत्य अवश्य है कि जो भी हमें जीवन के मार्ग को सरल, सफल मनोरंजक व सार्थक बनाने में सहायक हो वह ही हमारा गुरु है।
गुरु, अध्यापक व टयूटर समानार्थ लगते अवश्य है परंतु है नहीं, ज्ञान-शिक्षा देने में समान अवश्य है परंतु उदेश्य निश्चित तौर पर अलग है। अध्यापक टयूटर भी शिक्षा प्रदान करते हैं परंतु वह उनके जीवन यापन का माध्यम भी है। गुरु एक जंगल में लगा विराट वृक्ष है जो प्रत्येक पथिक को अपनी छाया फल व अन्य लाभ देता है। अध्यापक एक बाग या बगले में लगा पौधा है। जिस पर कुछ सीमित व्यक्तियों का अधिकार है और उपयोग सीमित है।
अब तक हम बात कर रहे है अध्यापक की जो हमें ज्ञान प्रदान करता है। भविष्य में जीवन-यापन के साधन उपलब्ध करने की पात्रता प्रदान करने में सहायक होने की दिशा में और यही वो गुरु से अलग एक शाखा का रूप ले लेता है। टयूटर केवल अपना दायित्व दिये गये कार्य, कोर्स में पारंगत करता है जरुरी नही कि वो सर्वागीण विकास करे।
अतः स्पष्ट है कि गुरु नि:स्वार्थ रूप से समाज सेवा हेतु सनातन परंपरा निभाने हेतु ज्ञान प्रदान करता है। अध्यापक बच्चों का शिष्यों का सर्वागीण विकास करता है और भविष्य में अर्थाजन करने में सहायक ज्ञान देता है और टयूटर सीमित विषय पाठ उत्तीर्ण होने हेतु प्रयास करता है। आज हम केवल अध्यापक विषय पर केन्द्रित करेंगे।

आदर्श अध्यापक-
जैसा कि आरंभ में बताया गया कि जीवन में बहुत अधिक अध्यापकों में से केवल कुछ ही हमें क्यों सदैव आकर्षित करते है आइये इस पर विचार करें कि कौन से गुण एक साधारण व आदर्श अध्यापक के अंतर के कारक है-

आकर्षक व शालीन व्यक्तित्व-
किसी को सुंदरता तो ईश्वर प्रदान करता है परंतु व्यक्तित्व का आकर्षण व शालीनता व्यक्ति के व्यवहार, पहनावा, चलने फिरने, उठने-बैठने, बोलने आदि विभिन्न गतिविधियों से निर्मित होता है। अतः किसी अध्यापक का व्यक्तित्व उपरोक्त सभी आदतों व गुणों से संतुलित होना आवश्यक है।

ज्ञान की पृबुद्धता-
किसी आदर्श शिक्षक में सामान्य ज्ञान की प्रबुद्धता अति आवश्यक है। ज्ञान की प्रबुद्धता का अर्थ है कि जीवन में बहुत से ऐसे गुण होते है जो हमारे स्लेबस का, पाठ्य पुस्तकों का हिस्सा ना होकर भी महत्वपूर्ण होते है। जिसमें हमारा समाज के प्रति, परम्पराओं को माता-पिता व प्रबुद्धजनों को आदर देेने का गुण, पशु पक्षियों, प्रकृति से, देश से प्यार व आत्मचिंतन का भाव, कर्तव्यों के निवर्हन का बोध आदि महत्वपूर्ण है जो आर्दश शिक्षक के व्यक्तित्व के आत्म साध होने आवश्यकता है।

उत्तम व उच्च शिक्षा-
आदर्श शिक्षक अपने विषय में पारगंत होना चाहिये। कोई भी व्यक्ति सर्वज्ञाता नहीं हो सकता परंतु अध्यापक से अपेक्षा की जा सकती है कि जिस विषय को स्तर या कक्षा को अध्यापन करने का दायित्व लेता है उसमें दक्ष हो और सदैव कुछ नया, आधुनिक सीखने की प्रकृति हृदय से हो। शिक्षक को सदैव हृदय से एक छात्र होना चाहिये और नित नये आयामों को सीख कर उसे अपने छात्रों तक पहॅुंचाने में दक्षता प्राप्त होना चाहिये।
आदर्श शिक्षक को मानव मनोविज्ञान का ज्ञान होना आवश्यक हैै। कम से कम उस आयुवर्ग का जिसकों शिक्षित करने का दायित्व उसने स्वीकार किया है। प्रत्येक आयुवर्ग में अलग-अलग संभावनायें होती है आदतें होती है और मस्तिष्क में विकास की अवस्था होती है। अध्यापक को उसका ज्ञान छात्रों के हित में उपयोग करना अवश्य आना चाहिये। उसे प्रत्येक छात्र के मानसिक स्तर पर उतर कर सहायता व विकास करना चाहिये।

दूर दृष्टि व संवेदना-
दूर दृष्टि व संवेदना भी किसी अध्यापक में विधमान विशेष गुण है। प्रत्येक छात्र के मानसिक व शारीरिक स्तर अलग अलग होता है। अध्यापक मे प्रत्येक छात्र में विधमान विशेष गुणों को पहचानने और विकसित करने की क्षमता होनी आवश्यक है। उसका छात्रों के गुणों के प्रति संवेदनशील और धैर्यवान होना आवश्यक है तभी उसे छात्रों के सर्वागीण विकास का लक्ष्य प्राप्त होगा।
खेलकूद, नृत्य, गायन इत्यादि में प्रवीणता आदर्श अध्यापक की अतिरिक्त योग्यता है किसी भी छात्र को पाठ्यक्रम में प्रवीण करना मुख्य कार्य अवश्य है परंतु सर्वागीण विकास का यह एक महत्वपूर्ण अंग मात्र है। अतः आदर्श अध्यापक को छात्रों में छिपे विशेष गुणों को पहचानकर उनके अनुरूप विकास का मार्ग प्रशस्त करना चाहिये। स्वयं एक आदर्श के रूप में बच्चों के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत करन चाहिये छात्रों को प्रोतसाहित करने की क्षमता अति आवश्यक है।

विश्वसनीयता, कर्मयता व सच्चाई-
अध्यापक द्वारा कहा वाक्य छात्रों के लिये एक आदर्श वाक्य बन जाता है। जिस पर छात्र पूर्ण विश्वास करते हैं अतः अध्यापक के व्यवहार शिक्षण में वाक्य विकास में शत-प्रतिशत सच्चाई होनी चाहिये। उसे पढ़ने से पूर्व प्रत्येक स्त्रोत से उस विषय पर आधुनिकतम ज्ञान व विश्वास आवश्यक है। इसमें कर्मथता भी आवश्यक है बच्चों को स्वयं कर के दिखाने में यह पुस्तकों के ज्ञान से भी उत्तम है।
आदर्श अध्यापक में नवीनतम, सामाजिक वैशविक शिक्षा संबंधी जानकारी व ज्ञान प्राप्त करने की प्रवृत्ति  होनी चाहिये माध्यम कुछ भी हो। क्यों उसके छात्र का अपने अध्यापक को ज्ञान का संपूर्ण भंडार मानते हैं और किसी भी क्षेत्र में पूछे प्रश्न का उत्तर देने की क्षमता होनी चाहिये। जिससे छात्रों की जिज्ञासा को उचित ज्ञान से शांत किया जा सके। यदि तुरंत किसी प्रश्न का उत्तर न हो तो लीपा पोती न कर उसे शांत कर छात्रों को बताने की प्रवृति अच्छी आदत है। सहनशीलता, क्षमावाक्ष, हंसमुख व निष्पक्ष होना किसी भी आदर्श अध्यापक के लिये अति आवश्यक है। युवावस्था में छात्र कुछ उदंडी, शरारती और बदतमीज भी होते हैं, अध्यापक को सहनशीलता उनको समझाने व समझने में सहायक होती है आप और मैं अध्यापक होने के लिये क्षमा का गुण होना चाहिए और ऐसे छात्रों को सही मार्ग पर लाने की क्षमता आवश्यक है। निपक्ष होना चाहिये हंसी मजाक से छात्रों का तनाव दूर होता है और वे मित्रवत अधिक सीखते व सम्मान करते है।
व्यक्तिगत संबंध व पारिवारिक पृष्ठभूमि के प्रति संवेदनशीलता एक अति महत्वपूर्ण गुण है। अध्यापक व्यक्तिगत संबंध व पारिवारिक पृष्ठभूमि के प्रति संवेदनशीलता एक अति महत्वपूर्ण गुण है। अध्यापक का प्रत्येक छात्र से सीमित व्यक्तिगत संपर्क जरुरी है। उसे उसके नाम से पुकारें उसकी पारिवारिक परिवेश की जानकारी रखें। अभिभावकों को उसके गुणों से अवगत कराये। कुछ भी कमी हो तो उचित समय व शब्दों से बतायें। कभी उसको अच्छे कार्य पर ईनाम दे। उससे इस प्रकार प्रेमपूर्वक व्यवहार करें कि आपके प्रति उसमें भय ना हो वा आपसे अपनी हर बात शेयर करे। उसका आचरण आपके दिशा निर्देशन व्यवहार से उत्तरोत्तर प्रगति करे। उसे आपके कारण विद्यालय में आने की उत्युकता हो। आपकी बातों को माता-पिता से शेयर करे।
मूल्यांकन एवं अन्वेषण करने की कुशलता अति महत्वपूर्ण है विश्व में मूल्यांकन का विशेष तौर पर शिक्षा के क्षेत्र में कोई भी मापदंड नहीं है प्रत्येक तरीके में कुछ अच्छाईयों व कमियां है परंतु 100 प्रतिशत मूल्यांकन की क्षमता व्यवस्थाओं में नहीं है इसलिये अध्यापनक में मूल्यांकन की प्रतिभा का अत्यंत महत्व है जिससे कि विद्यार्थियों का मूल्यांकन उनके विकास के लिये हो ना कि हत्तोसाहित करने के लिये अन्वेषण भी बहुत महत्वपूर्ण है कि किसी विषय में छात्र में गहन विश्लेषण उसको भविष्य में अपनी कमजोरियों पर विजय में सक्षम बनाता है। मूल्यांकन व अन्वेषण सदैव निष्पक्ष होना चाहिये और उसका एक मात्र उदेश्य छात्रों व समाज का विकास होना चाहिए जिससे कि भावी पीढ़ी का भविष्य उज्जवल हो सके।
संपर्ण गुणों का समावेश एक लेख में करना संभव नहीं, परंतु मुझे विश्वास है कि यदि उपरोक्त गुणों का समावेश आपमें है तो आप एक आदर्श अध्यापक बनने की दिशा में अग्रसर है। आपको केवल हृदय में धारणा करना है कि मैं जीवन में निस्वार्थ शिक्षा का प्रचार व प्रसार करुंगा। मुझे ईश्वर ने मानवजाति की भावी पीढ़ी के विकास का कार्य दिया है उसे अपनी क्षमताओं का सर्वोत्तम इस्तेमान कर निभाउंगा। शिक्षा देना मेरी पूजा है,  मेरा कर्म है तो निश्चिंत रहिये, आपको आपके छात्र जीवन पर्यन्त हृदय से आभार प्रकट करेगें। आपके लगाये पल्लवित किये ये पौधे समाज को भी पल्लवित पुष्पित करेगें।

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