पुस्तक परिचय-हा! वसंत!

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पुस्तक परिचय-हा!वसंत!-डॉ.पंकज साहा,मानव प्रकाशन ,131चित्तरंजन एवेन्यू,कोलकाता-700073.
प्रथम संस्करण-2019,मूल्य-₹450(सजिल्द)
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डॉ.पंकज साहा जी लम्बे प्राध्यापकीय अनुभव को अपनी रचनाओं में समेटते हुए व्यंग्य की दुनिया में आये हैं।यह डॉ.साहा की चौथी पुस्तक है।अभी हाल में ही डॉ.साहा की पुस्तक हिंदी उपन्यास में किसान ,बहुत ही चर्चित हुई है।
लघुकथा,कहानी,कविता,हाईकु,निबंध,आलोचना से होते हुए व्यंग्य पर कलम चलाते हुए साहा जी कबीर,भारतेंदु,प्रेमचंद,परसाई एवं श्रीलाल शुक्ल की परम्परा को कायम रखते हुए अपने युग के प्रति ईमानदार समस्त व्यंग्यकारों को सादर समर्पित करते हैं-”हा!वसंत ! को।
जीवन और समाज की विसंगतियों का उद्घाटन और उसका परिष्कार करना व्यंग्यकार का लक्ष्य होता है।जिसमें डॉ.साहा सार्थक सिद्ध होते हैं।
साहित्य का नया सौंदर्यशास्त्र गढ़ने में व्यंग्य की महती भूमिका है।वर्तमान समय में व्यंग्य एक स्वतंत्र साहित्यिक विघा के रूप में स्थापित है।बहुत पहले  हास्य-व्यंग्य को साहित्य के  हाशिये ही रखा जाता था।व्यंग्य ही वह विघा है जिसने अपने समय एवं समाज की विसंगतियों,शोषणों,छद्मों का उद्घाटन करके एवं सच्चाईयों को प्रकट करने के लिए हिंदी के व्यंग्यकारों ने कटु प्रहारों एवं मधुर कटाक्षों द्वारा साहित्य का एक नया सौंदर्यशास्त्र गढ़ा है।
डॉ.साहा ने अपने व्यंग्य संग्रह में मध्य मार्ग को अपनाया है।यह मार्ग न तो पार्टी लाईन वाला है,न मठ के आगे सर झुकाने का।अपने जीवन के वसंत को पार करते हुए ,स्वानुभूति का चित्रण है।अपनी बात में डॉ.साहा लिखते हैं–“मेरा यह व्यंग्य-संग्रह न गंभीर है न चटपटा है।मैंने बीच का रास्ता लिया है,जिसपर चलते हुए मैंने वैयक्तिक,सामाजिक,राजनीतिक एवं अन्य विसंगतियों,छद्मों पर कटाक्ष किया है।किसी व्यक्ति विशेष को आहत करने अथवा किसी संस्था पर प्रहार करने की मेरी बिलकुल मंशा नहीं है।अनजाने में ऐसा हुआ हो,तो क्षमाप्रार्थी हूँ।”
इस पुस्तक पर अपना विचार प्रकट करते हुए प्रो.आलोक पुराणिक लिखते हैं–व्यंग्यकार की एक बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है-बौद्धिक तौर पर शीर्षासन करने की।”पंकज साहा इसी बौद्धिक शीर्षासन के तहत अपनी एक रचना में  जो लिखते हैं,उसका आशय यह है कि वीर ही वंसुधरा को भोगते हैं,यह बात पुरानी है,अब नयी बात यह है कि जो वंसुधरा को भोग रहा है,वही वीर है।”बुद्धिजीवी की विसंगतियों पर डॉ,साहा जमकर प्रहार करते हैं।
संकलन के पहले लेख’हा!वसंत!से शुरू करके आखरी लेख तक पहुँचते हुए पंकज जी अपने आसपास की अनेकानेक विसंगतियाँ देखते और दिखाते हैं।इनमें अपने आसपास गायब होते वसंत की बात है,नकल करते विद्यार्थी का सौंदर्य दर्शन है,रेल अधिकारी की दोस्ती के सहारे बिना टिकट चलने के किस्से हैं और शब्द लीला भी।जूता-महिमा व्यंग्य में अलग आदमियों के अनुसार झगड़े के तरीके बताते हैं–“शऱीफ आदमियों का झगड़ा होता है,तो दुआ सलाम बन्द हो जाती है,घटिया आदमियों के झगड़े में जूते चलते हैं।”
व्यंग्यकार डॉ.सुरेश कांत जी डॉ.पंकज साहा की व्यंग्य दृष्टि पर विचार प्रकट करते हुए लिखते हैं कि—“साहित्य में गुटबाजी यों तो कब नहीं रही,पर जितनी अब है,पहले कभी नहीं थी,खासकर हिंदी-व्यंग्य में।इसी का असर है कि बहुत से-ऐसे व्यंग्यकारों की ओर ध्यान नहीं जा पाता,या कहिए कि जाने नहीं दिया जाता,जो चुपचाप लिख रहे हैं और उन लेखकों से कहीं अच्छा लिख रहे हैं,जिनके नाम गुटाधिपति जप-जपकर आगे बढ़ाते रहते हैं।इससे उन लेखकों का कोई खास लाभ नहीं होता,क्योंकि गुट में शामिल होने के बाद उनकी क्षमताओं का उपयोग रचनात्मक लेखन के बजाय विरोधियों के खिलाफ भड़ास निकालने भर में होने लगता है—।डॉ.साहा गुट से दूर रहकर सृजन करने वाले है।
रामनगीना मौर्य जी लिखते हैं–“जैसे केले के पात-पात में पात की बात कही जाती है,वैसे ही व्यंग्यकार की बात- बात में बात निकाल लेता है।वह एक तीर से न जाने कितने ही निशाने साध लेता है,बस्स–समय और समाज पर नजर पारखी,पैनी और कोलंबसी होनी चाहिए।डॉ.पंकज साहा रचित’हा!वसंत!’के अनमोल नगीनों,यथा-सीनियर सिटीजन,शब्द-लीला,गरीब,हिंदी की विचित्रता,जूता-महिमा,कुलीनता-बोध,जैसी बहे बयार,डिजिटल इंडिया,मुद्दा संकट,किताब-चोरी,अंतरात्मा,घुसपैठिए,एक अदद पूँछ की तलाश,आत्मामुक्त आदमी की आवश्यकता,गंभीर चिंतन,मजबूरन को नहिं दोष गुसाईं,भाँति-भाँति के कवि,एटी प्लस आदि रचनाएँ पढ़ते हुए हम ऐसे ही अनुभवों से दो -चार होते हैं।”
कुल 86 व्यंग्य है इस संग्रह में।अनेक विद्वानों का विचार भी है डॉ.साहा के व्यंग्य लेखन एवं भाषा -शैली पर।यथा-डॉ.प्रेमशंकर त्रिपाठी,डॉ.सुरेश कांत,डॉ.कमलेश द्विवेदी,डॉ.राजीव कुमार रावत,रामनगीना मौर्य,डॉ.सी.भास्कर राव,डॉ.राजेश कुमार मांझी तथा अजयेंद्र त्रिवेदी ।
डॉ.पंकज साहा को बधाई,जो कविता,कहानी,आलोचना से होते हुए व्यंग्य साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।
【समीक्षक-रणजीत कुमार सिन्हा,पश्चिम मिदनापुर,पश्चिम बंगाल।】

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