हम कहाँ जा रहे हैं ?

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हम कहाँ जा रहे हैं ?
धर्म के रास्ते को छोड़
पाप की खाई में गिरते जा रहे हैं |
हम कहाँ जा रहे हैं…

हमारे ऋषि-मुनियों वाले गुण –
पवित्रता /सरलता /न्यायप्रियता /विनम्रता /विद्या /
सत्यवादिता /तप-साधना और
ईश्वर भक्ति सब न जाने कहाँ खो गये ?
बस अब हम कोरे दिखावे की पहचान हो गये |

हमने विश्वगुरु बनने का देखा था सपना
हमारे पूर्वजों ने उसे एक हद तक पूरा कर भी दिया
पर हमने उसे चकनाचूर कर दिया |
हम उनकी धरोहर को नहीं संभाल पाये
हमने ढोंग पे ढोंग रचाये |

हम कहाँ जा रहे हैं ?
घिनौने से घिनौने कुकर्म में
परचम लहरा रहे हैं
आखिर हम कहाँ जा रहे हैं…?

हमारी पहचान पवित्र रिस्तों से होती थी,
कर्त्तव्य और संस्कारों से होती थी
पर अब सब तार-तार हो रहा है
इंसान इंसानियत को निगल रहा है ||

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

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