नैनीताल के एक हिस्से से दूरबीन से हिमालय दर्शन

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नैनीताल के एक हिस्से से दूरबीन से हिमालय दर्शन करने के बहाने- (पहला यात्रा वृतांत लिखने का प्रयास) हिमालय का एक विस्तृत और पुराना इतिहास है। विभिन्न सम्पदाएँ देने वाला और हमेशा हमारी रक्षा करने वाली इस खूबसूरत पर्वत श्रृंखला पर सिनेमा में गाने भी फिल्माए गए हैं। मुझे घुमक्कड़ी जीवन बेहद पसंद है। हिंदी साहित्य के महान घुमक्कड़ी साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन की भांति मैं भी हर जगह से कुछ न कुछ सीखते हुए अपने सीमित ज्ञान कोष को बढ़ाने की कोशिश में लगा रहता हूँ। वैसे भी एक शेर है
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ।
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ।।
ख़ैर इस बार हिमालय को तकरीबन 450 किलोमीटर से ही देखने का मौक़ा मिला। लेकिन इतनी दूर से भी शरीर में झुर-झुरी फ़ैला देने वाली ठंडी पुरवाई का अहसास हिमालय करवा रहा था। इतनी दूर से हिमालय को दूरबीन/टेलिस्कोप के माध्यम से देखा और वहाँ मौजूद 2 मंदिर एक शिव-पार्वती का और एक हनुमान जी का जोकि सेंक द्वारा बनाए गए हैं। इन प्राचीन मंदिर को फिलहाल दूरबीन से देखने पर भी जो रोमांच हो रहा था तो पास जाने पर तो फ़िदा हो जाना और अपनी प्रकृति पर इठलाना लाज़मी है। मुझे प्रकृति से बेहद प्रेम है। इसलिए समय समय पर घर में, गांव में पेड़ पौधे लगाता रहता हूँ। प्रकृति से जितना प्रेम है उतना ही जनसंख्या से भय भी लगता है। हमारे देश का जवान जिस तरह से हमारी रक्षा के लिए दुश्मनों से लड़ता है और गोलियां खाता है ठीक उसी तरह उन गोलियों को सहन ये हिमालय भी करता आया है। हिमालय उन तमाम अच्छे बुरे दौर का साक्षी रहा है और रहेगा जो भी उसके सानिध्य में होगा। हमें अपनी प्रकृति को बचाने के लिए आगे आना चाहिए। हालांकि इसकी खूबसूरती से हमारा भारतीय सिनेमा भी अछूता नही रहा है। और सबसे पहले
1943 की फ़िल्म किस्मत में इसका बखान किया गया।
गाना कुछ इस तरह था।
आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है।
दूर हटो-दूर हटो ए दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है।।
इसके बाद जो फ़िल्म याद आ रही है वह है-
फूल बने अँगारे 1963 जिसका गाना
हिमालय की बुलुन्दी से सुनो है आवाज आई।
वतन पे जो फिदा होगा, अमर वो नोजवान होगा।।
फिल्मी दुनिया के अलावा हिंदी साहित्य में सोहनलाल द्विवेदी की एक कविता भी है-
खड़ा हिमालय बता रहा है
डरो न आंधी पानी में।
खड़े रहो तुम अविचल हो कर
सब संकट तूफानी में।।
डिगो ना अपने प्राण से, तो तुम
सब कुछ पा सकते हो प्यारे,
तुम भी ऊँचे उठ सकते हो,
छू सकते हो नभ के तारे।
अचल रहा जो अपने पथ पर
लाख मुसीबत आने में,
मिली सफलता जग में उसको,
जीने में मर जाने में।
#हिमालय का एक #इतिहास तथा उसके कुछ रोचक तथ्य-
हिमालय एक पर्वत श्रृंखला है जो भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया और तिब्बत से अलग करता है। यह पर्वत श्रृंखला मुख्य रूप से तीन समांतर श्रेणियों महान हिमालय, मध्य हिमालय और शिवालिक से मिलकर बना है जो पश्चिम से पूर्व की ओर एक चाप की आकृति में लगभग 2400 किलोमीटर की लंबाई में फ़ैला हुआ है। इसकी लम्बाई पांच देशों की सीमाओं को आपस में जोड़ती है।
#भारत, #पाकिस्तान, #नेपाल, #भूटान और #चीन
इन देशों को जोड़ने वाली इस पर्वत श्रृंखला से #सिंध, #गंगा, #ब्रह्मपुत्र जैसी पवित्र नदियों का उद्भव होता है। जो हिमालय की गोद से बेशक़ निर्मल और स्वच्छ रूप में बहती है। लेकिन अफसोस कि उन्हें अपने आस-पास आते आते हम इतना गंदा कर चुके हैं कि वे पवित्र नदियों की बजाए एक नाले में तब्दील हो चुकी हैं। इसके अलावा हमारी सरकारें साल-दर-साल लम्बे चौड़े भाषणों में करोड़ों-अरबों रुपए के निवेश और आवंटन की घोषणा तो कर देती है, किंतु आज भी वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति बनी हुई है। सरकारों के अलावा सबसे बड़े गुनहगार हम स्वयं भी हैं। हमने जीवनदायनी प्रकृति को एक दम निचोड़ लिया है। दूर कहाँ जाऊँ मेरे घर-परिवार में भी हजारों बार उन्हें समझाने के तत्पश्चात वही स्थिति बनी हुई है। पानी को बेहिसाब बर्बाद करने की जो आदत मेरे परिवार और आपके परिवार की आदतों में शुमार हो चुका है। निःसन्देह हम एक बड़े विनाश की और अपने आपको तथा अपनी आने वाली पीढ़ी को उस ओर ढकेलते जा रहे हैं।
हिमालय पर्वत ने दक्षिण एशिया की संस्कृति को गहराई से रचा है। हिमालय की कई चोटियों(क्षेत्र) में हिंदुत्व और बुद्धिज़्म धर्म को मानती हैं और उसमें उसकी एक गहरी छाप दिखाई देती है, छाप सभ्यता कि, संस्कृति की और छाप हमारे वजूद की।
देखा जाए तो हिमालय का नामकरण संस्कृत के हिम और आलय शब्द के संयोग से बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ है बर्फ का घर। एमिली डिकिन्सन की कविता में हिमालय को हिमलेह भी कहा गया है।
हिमालय का एक और रोचक तथ्य यह है कि यह बर्फ से हिमाच्छादित करने वाला तीसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है। इसके बाद अन्टार्कटिका और आर्कटिक आते हैं। हिमालय की श्रृंखलाएं 1500 ग्लेशियरों को घेरती हैं और एक शोध के मुताबिक यह ग्लेशियर 1200 किलो मीटर साफ पानी अपने में जमा करके रखता है। हमारे लिए हिमालय का महत्व केवल इतना ही नहीं है अपितु इसके इतर हिमालय पर्वत के प्रदीर्घ इतिहास में हिमालय पर्वत विभिन्न प्राकृतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय कारकों की वजह से भी महत्वपूर्ण होना है। यह न केवल हमारे और अपने आसपास के देशों के लिए महत्वपूर्ण है और महत्व रखता है बल्कि पूरे विश्व के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण तथा अहम है। क्योंकि यह ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद सबसे बड़ा हिमाच्छादित क्षेत्र है जो विश्व के एक बड़े भूभाग के जलवायु क्षेत्र को भी प्रभावित करता है। इसके महत्व को देखें तो हम पाते हैं कि- प्राकृतिक महत्व के नजरिये में यह उत्तरी भारत का मैदान या सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान हिमालय से लाये गए जलोढ़ निक्षेपों से निर्मित करता है। इसकी विभिन्न पर्वत श्रेणियां मानसूनी पवनों के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करके इस क्षेत्र में पर्वतीय वर्षा कराती हैं। जिसका प्रभाव इसके आसपास के क्षेत्रीय पर्यावरण पर भी पड़ता है साथ ही यह हमारे साथ विश्व की अर्थव्यवस्था को भी काफी हद तक प्रभावित करता है।
आर्थिक महत्व के नजरिये से देखें तो हम विभिन्न शोध के माध्यम से जानते हैं कि हिमालय की वजह से ही भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश को जल की प्राप्ति होती है और इससे सबसे बड़ा आर्थिक लाभ यह होता है कि इस क्षेत्र से वन संसाधन भी प्राप्त होते हैं।
विभिन्न महत्वों के अलावा इसका औषधीय महत्व भी है। इसकी पवित्र गोद में पनपने वाले विभिन्न पेड़-पौधों से औषधीय पौधे भी प्राप्त किये जाते हैं। हिमालय का एक महत्व यह भी है कि यह चारागाह के रूप में अधिक इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि इस क्षेत्र से मुलायम घास मिलती है। हिमालय नमक और विभिन्न चूना पत्थर के स्त्रोत के रूप में भी हमारे लिए लाभदायक है। फलों की खेती हो या कोई और सभी को मिलाकर यह हमें जीवन देने वाला है।
हिमालय इतनी सम्पदाओं और विशेषताओं से भरपूर है कि इसका पर्यावरणीय महत्व भी हमारे जीवन में अहम भूमिका निभाता है। इसका सम्पूर्ण क्षेत्र जैव विविधता से परिपूर्ण है। जैव विविधता के प्रमुख क्षेत्र के रूप में फूलों की घाटी तथा अरुणाचल का पूर्वी हिमालय क्षेत्र है। जिसकी जलवायु का वैश्विक प्रभाव होता है। हिमालय के हिमनदों को आज जलवायु परिवर्तन के प्रमुख संकेतकों में से एक माना जा रहा है। जिसके भी गुनहगार हम ही हैं।
कुलमिलाकर सम्पूर्ण रूप में हमारे लिए एक सच्चे तथा विश्वसनीय मित्र की भूमिका निभाने वाली यह पर्वत श्रृंखला
दक्षिण एशिया के लिए हमेशा से महत्व रखता है।क्योंकि यह उसके लिए एक प्राकृतिक अवरोध है। जो इसके उत्तर के सैन्य आक्रमणों को अल्प संभाव्य बनाता है और हाल ही में कश्मीर और सियाचिन विवाद जो हुआ वह भी इसी पर्वत श्रृंखला के एक हिस्से में अवस्थित है। इसके अलावा यह भी जानने योग्य तथ्य है किहिमालय की उच्च भूमि के कारण ही नेपाल अपनी बफर स्टेट की स्थिति को सुरक्षित बनाये हुए है।
तो इतने संसाधन देने वाले इस हिमालय पर्वत का तथा हमारे आसपास की प्रकृति का हम ही ध्यान नहीं रखेंगे तो कोई ऊपर से तो आने वाला नहीं है। अभी भी बहुत वक्त है हमें चेत जाना चाहिए और प्रकृति के रक्षार्थ अपने मजूबत कदम बढ़ाने चाहिए। इसके लिए जितना सरकार करती हैं उससे कहीं  बढ़कर हमें भी करना होगा तभी हम अपने आनी वाली पीढ़ी को कुछ दे पाएंगे।

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