हिंदी भाषा और मैं

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avdesh avadh
मैं जब अस्तित्व में आया तो जैविक प्राणी था, हिंदी भाषा ने विभिन्न चरणों में परिष्कृत करके व्यक्तित्व युक्त किया। किसी व्यक्ति की पहचान में उसकी भाषा अहम होती है जो सम्प्रेषण द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को जोड़ती है। देवभाषा संस्कृत आचार्यों के गुरुकुलों से बाहर निकलते समय अपने आवरण और व्याकरण में थोड़ा परिवर्तन की और हिंदी का उद्भव हो आया।
किसी राष्ट्र के लिए एक राष्ट्रीय भाषा का होना जरूरी है। दुर्भाग्यवश हिंदी राष्ट्रीय भाषा बनते – बनते रह गई। किसी अन्य भाषा में राष्ट्रीय भाषा बनने की क्षमता नहीं है इसलिए हिंदी सम्वैधानिक रूप से राष्ट्रीय भाषा न होते हुए भी व्यावहारिक रूप से है। पूर्वोत्तर राज्यों में मणिपुर के भीतर कुछ भागों में हिंदी विरोध का प्रायोजित स्वर गूँजता है। दक्षिण भारत के तमिलनाडु में हिंदी विरोध ही करुणानिधि की राजनीति का आधार था। करुणानिधि के देहावसान के उपरान्त दक्षिण भारत में हिंदी विरोध का स्वर खत्म हो गया। पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में कुछ स्थानीय राजनीतिक पार्टियाँ कभी- कभी ऊपर उठने के लिए विरोधी स्वर उठाती हैं किन्तु जागरूक जनता अब उनके झाँसे में आने को तैयार नहीं।
आज की नई पीढ़ी जिसे एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में शिक्षा, नौकरी और व्यवसाय के लिए अनवरत आना – आना या सम्पर्क में रहना होता है, ने लेखन के लिए अंग्रेजी और वाचन के लिए हिंदी को चुना है। यह सत्य स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि स्थानीय भाषाएँ घर की सीमा में सिमट रही हैं।
हिंदी भाषा में सबसे इतर यह विशेषता है कि यह सबको अपने आँचल में समभाव जगह देती है, केन्द्र में रहकर हर किसी को जोड़े रखती है। इसीलिए भारत के हर भूभाग में, हर भारतीय स्थानीय भाषाओं के बीच में यह प्रत्यक्ष या परोक्ष उपस्थित है। इसके सहज व्याकरण ने इसकी उपस्थिति को और सरल कर दिया है।
देश की सांस्कृतिक प्रयोगशाला कहे जाने वाले पूर्वोत्तर भारत में हिंदी का विस्तार आशान्वित करता है। यह जनसम्पर्क भाषा के रूप में सभी भाषा भाषियों के बीच सम्प्रेषण का माध्यम है। दक्षिण भारत की नई पीढ़ी इससे बहुत प्रभावित है। मध्यभारत तो इसका पुराना घर है।
अब मैं पूरे भारत और निकटवर्ती बाहरी परिक्षेत्र में हिंदी भाषा के बल – बूते स्वाभाविक भ्रमण, व्यवसाय या नौकरी कर सकता हूँ और किसी भी भाषा – भाषी से हिंदी के सहारे सहज मिल जुल सकता हूँ। मेरी पहचान, मेरा व्यक्तित्व, मेरा व्यवसाय हिंदी भाषा से है।
अवधेश कुमार ‘अवध’

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