हिंदी दिवस और हिंदी स्वीकार्यता (हिंदी दिवस विशेष)…

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भाषिक तौर पे हम एक समृद्ध राष्ट्र के नागरिक हैं। हमारे देश में कुल 1652 मातृभाषायें हैं। इसके साथ ही देशभर में करीब 58 भाषाओं में स्कूलों में पढ़ायी की जाती है। और यही हमारे देश की विशेषता है कि यहाँ विभिन्नता में एकता का सूत्र नजर आता है। और भाषा के क्षेत्र में विभिन्नता में एकता का यह स्वरूप राष्ट्र भाषा हिन्दी के कारण ही अक्षुण है।

जहां हमारे संविधान ने देश की अखंडता को बनाये रखने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों के 22 अलग-अलग भाषाओं को मान्यता प्रादान की है। वहीं इस देश में शास्त्रीय भाषाओं के तौर पे भी संस्कृत, कन्नड़, मलयालम, तेलुगू , तमिल और उड़िया भाषाओं को मान्यता दी गई है। पर इन सबके बीच विश्व में सबसे अधिक बोली जानेवाली द्वितीय भाषा हिन्दी ने राष्ट्र भाषा के रुप में स्वीकृति प्राप्त की है। पर इसके बावजूद हमारे लिए यह बड़े ही संताप का विषय है कि विश्व में सबसे अधिक बोले जानेवाली भाषाओं में अग्रणी स्थान प्राप्त हिन्दी जैसी एक मधुर राष्ट्र भाषा होते हुये भी हमारा चिंतन विदेशी हो गया है। एक गौरवमयी भाषा के अधिकारी होते हुये भी हम अज्ञानीयों की तरह वार्तालाप में अंग्रेजी का प्रयोग करने में गौरव बोध करते हैं, फिर चाहे हमारे द्वारा प्रयोग की गई अंग्रेजी अशुद्ध ही क्यों न हो। और प्रकृतार्थ में यह सब हमारी विकलांग हो चुकी गुलाम मानसिकता का असर है। और अब हमें इन सबसे बाहर निकलना होगा। अगर वाकई में हम भारत को विश्वगुरु बनाना चाहते हैं तो हमें सर्वप्रथम अपनी संस्कृति और भाषा को मान देना होगा। हमें अपनी सुमधुर भाषा हिंदी को सभी की जुबान पर लाने का प्रयत्न करना होगा। और इसके लिए सबसे पहले हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी। हमें स्वयं में बदलाव लाकर हिन्दी का प्रयोग करने में गर्व अनुभव करना होगा। फिर चाहे सरकारी कार्यालय हो,बैंक हो, अथवा हम जहां भी कार्य करते हैं वह कार्यस्थान हो हमें हर जगह हिन्दी का प्रयोग अधिकाधिक करना होगा। हमें प्रयत्न करना होगा कि हमारे देश में किसी भी सरकारी कार्यालय में कार्य हिंदी में ही हो। यहां तक कि देश की शीर्ष अदालतों का कार्य भी हिन्दी में हो हमें इसके लिए भी प्रयत्नशील होना होगा। और तो और बिजली, पानी आदि का बिल भी जनता को हिन्दी में ही दिया जाना चाहिए जिससे हिंदी अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार हो सके। फिर सभी सरकारी तथा गैरसरकारी विद्यालयों में प्राथमिक स्तर से लेकर स्नातक तक हिन्दी अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जानी चाहिए। तब जाकर कहीं हम एक महाशक्ति के रुप में उभर पायेंगे।

बिना संकोच के हमें इस सत्य को मानना होगा कि अपनी भाषा के महत्व को जाने बिना हम कभी सक्षम नहीं बन सकते। और एक राष्ट्र के रुप में यह हमारा दुर्भाग्य है कि इस संसार में आज हमारी हिंदी ही अपनों के द्वारा सबसे अधिक तिरष्कृत की गई भाषा के रुप में परिचित है। हिन्दी संसार की सबसे समृद्ध भाषा होते हुए भी आज अपना वजूद खो रही है। और इसके लिए कहीं ना कहीं हम सब ही जिम्मेदार हैं। हिन्दी के प्रति हम हिन्दुस्तानीयों का बेरूखी भरा रवैया ही हमारी इस गौरवमयी भाषा के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। हिन्दी के प्रति हमारे व्यवहार के कारण ही आज हिन्दी अपने ही देश में द्वितीय दर्जे की भाषा बन गई है जो हमारी सभ्यता और संस्कृति दोनों के लिए ही घातक है। क्योंकि हमारी हिंदी केवल हमारे विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम भर नहीं है बल्कि यह हमारी संस्कृति का परिचायक है। तभी डॉ. जाकिर हुसैन साहब का वह कथन कि “हमारी राष्ट्रीय एकता का सर्वश्रेष्ठ माध्यम हिंदी है” आज भी पहले की तरह ही प्रासंगिक बना हुआ है।

पर हिंदी के प्रति हमारी सरकारों का रवैया भी काफी निराशाजनक रहा है। और इसका प्रमाण अधिवक्ता शिवसागर तिवारी की जनहित याचिका से मिलता है। जब उच्चतम न्यायलय तथा देश की सभी उच्च न्यायलयों की भाषा हिन्दी करने के लिए दायर उनकी याचिका के जवाब में केंद्र सरकार ने अदालतों की भाषा हिन्दी करने से मना कर दिया था। जबकि अपनी याचिका में तिवारीजी ने स्पष्ट कहा था कि उच्च न्यायपालिका में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग ब्रिटिश हुकूमत की विरासत है, जिसका अब त्याग कर देना चाहिए। उन्होंने इस भाषा को गुलामी की भाषा करार दिया था। पर धन्य है हमारी वह व्यवस्था जिसने राष्ट्रभाषा के प्रति उनके इस अनन्य प्रेम के बदले उनपर एक लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया। हालांकि यह भारी-भरकम जुर्माना बाद में माफ कर दिया गया, लेकिन साथ ही उन्हें अदालत से यह कड़ी चेतावनी मिल गई कि वह भविष्य में  इस तरह की बेमतलब याचिकाएं दायर नहीं करेंगे। पर ऐसे में यहां सवाल यह उठता है कि क्या राष्ट्रभाषा को सम्मान दिलाने की बात कहना अब इस देश में बेमतलब की बात रह गई है? हिंदी की उत्थान की बात कहने वाले इस राष्ट्र में हिंदीहितों के चिंतन पर भारी-भरकम जुर्माना लगाना क्या सही है? हिंदी दिवस के इस महान अवसर पर आज इन बातों पर गौर करना नितांत ही आवश्यक हो चला है।

वैसे भी 2001 के जनगणना के अनुसार भारत की कुल 43% जनसंख्या की प्रथम भाषा हिंदी है जबकि 30 % से ज्यादा लोग हिन्दी को द्वितीय वरीयता देते हैं। वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा मानने वाले लोगों की संख्या तत्कालीन कुल जनसंख्या की 0.2% के लगभग है। और हमारे देश की लगभग  99.98% आबादी अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा के रूप में स्वीकार नहीं करती है। ऐसे में इस देश की उच्च न्यायिक प्रक्रिया में तथा देश के अन्य कार्य क्षेत्रों में हिंदी को उचित स्थान न दिया जाना क्या अप्रासंगिक एवं अतार्किक नहीं है?

  अब समय आ गया है जब हमें यह समझने की जरुरत है कि हिंदी एक समृद्ध भाषा है। अपनी भाषा है। एक ऐसी भाषा जिसके समृद्ध शब्द भंडार दिल के भावों को प्रकट करने के लिए एक से बढ़कर एक खुबशूरत व नायाब शब्द पुष्प हमें देते हैं। यह एक ऐसी भाषा है जो अनेकों अतुलनीय महाकाव्यों की साक्षी है। यह हिंदी ही है जिसे संसार की सबसे मिठी व सुरिली भाषा होने का गौरव प्राप्त है। पर आज वही हिंदी खुदको वृद्धाश्रम में रहती किसी वृद्धा की भांती बिल्कुल अकेली व असहाय महसूस कर रही है और इसके जिम्मेदार हम हैं। ‘हम’ अर्थात आप,मैं और हमारी ही तरह बाकी के सभी हिंदी को बोलने व समझने वाले लोग। याद रखिये आज हमने ही हिन्दी को गर्त में ढकेला है। आज हम सभी आधुनिकता के चकाचौंध में ऐसे रम गए हैं कि हम अपने दूधमुहे बच्चे तक को अपनी मातृभाषा में “मां-बाबूजी” कहना सिखाने के बजाय “मम्मा-पापा” कहना सिखाते हैं और  “क,ख,ग” के स्थान पे “A,B,C,D” लिखना-पढ़ना सिखाते हैं। यह बात सुनने में छोटी तो लगती है पर असल में यह बहुत मोटी बात है और इस पर अगर जरा सा गौर किया जाय तो पता चलता है कि वास्तव में हमसब कभी कोशिश ही नहीं करते हैं कि अपने बच्चों को ‘ए फॉर एपल’ के स्थान पे ‘अ से अनार’ कहना सिखाएं। यहां तो बच्चों को शिक्षित बनाने के बजाय दुनिया की देखा-देखी हम उन्हे कॉनवेन्ट स्कूलों में भेजते हैं,जहां वे बस जॉब सीकर बनके रह जाते हैं और ये सब बस यहीं खत्म नहीं होता है बल्कि अंग्रेजियत के चंगुल में फंसकर हमारे बच्चे अपनी सभ्यता,संस्कृति व भाषा से दूर होते जाते हैं।

वैसे अगर बात हिन्दी के प्रचार-प्रसार कि करें तो हमें उस दौर को भी याद करना होगा जब बॉलीवुड के सिनेमाओं ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अभुतपूर्व योगदान दिया था। बस जबरदस्त संवाद के दम पे फिल्म चलनेवाले उस दौर में लिखे गये संवाद जो पूरी तरह हिन्दी के होते थे वे लोगों के मन में हिन्दी के प्रति अपनेपन का भाव जगाते थे। पूर्ण हिन्दी में लिखे गये उन लोकप्रिय संवादों को सुनकर लोग हिन्दी के प्रति आकर्षित होते थे। लोगों में हिन्दी बोलने व सुनने को लेकर अनोखा रूझान जन्म लेता था। पर समय के साथ हिन्दी फिल्मों में भी बदलाव आने लगें। चंद ऐतिहासिक पृष्टभूमि पे बनने वाली फिल्मों को छोड़कर अधिकतर आधूनिक हिन्दी फिल्मों के संवाद हिंग्लिश में लिखे जाने लगें । इसि के साथ बॉलीवुड सिनेमाओं के स्तर में भी निम्नता आती गई और दिखावे के चक्कर में इन हिंग्लिश फिल्मों में बोल-चाल की भाषा के तौर पर हिंदी से अधिक अंग्रेजी भाषा का प्रयोग होने लगा। इतना ही नहीं बल्कि बॉलीवुड की सिनेमाओं में बजनेवाले गीतों में भी अंग्रेजीयत का जलवा छाने लगा। गीतों के बोल हिंदी से अधिक अंग्रेजी में लिखे जाने लगें। रैप सोंग के नाम पर अंग्रेजी की अश्लीलता पड़ोसी जाने लगी। इस तरह के दिखावों से अक्सर फिल्मों से प्रभावित होने वाली हमारी युवा पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर होती चली गई और रही-सही बाकी कसर पूरी कर दी पश्चिमी सभ्यता ने। इंटरनेट के जरिए तेजी से फैलती पश्चिमी सभ्यता ने हमारे युवाओं को बहकाना आरम्भ कर दिया। अंग्रेजी सभ्यता के गिरफ्त में आकर पहनावें के साथ-साथ लोग अपनी जुबान भी बदलने लगे। अपने को अधिक सभ्य व स्मार्ट दिखाने के चक्कर में युवाओं के साथ ही कुछ बड़ो ने भी अंग्रेजी का दामन थाम लिया। आज तो नौबत ऐसी आ गई है कि हम चाहे किसी से भी बात कर रहें हों पर हमारे बोलचाल के वाक्यो में हिन्दी से अधिक अंग्रेजी के शब्द होते हैं और इसका कारण है अपनी भाषा के प्रति हमारा अवहेलना वाला रवैया । हमें ऐसा लगता है कि अगर हम शुद्ध हिन्दी में बात करेंगे तो लोग हमें गवार समझेंगे। हम ये भूल जाते हैं कि शुद्ध हिन्दी में बात करने के लिए हमारे अंदर हिन्दी के समृद्ध शब्द भंडारों का ज्ञान होना भी अति आवश्यक है। अंग्रेजी का क्या है ? हमारे यहां तो झाड़ूवाला भी लड़खड़ाती अंग्रेजी बोल लेता है।

रही बात हिंदी को लेकर चिंतन की तो हमसब अक्सर चाय की दुकानों पे बैठकर, चौपालों में,यार-दोस्तों के संग गप्पे हांकते हुए हिन्दी की रूग्ण अवस्था के लिए काफी अफसोस जाहिर करते हैं,पर इसे बचाने की कोशिश हम तिल बराबर भी नहीं करते हैं। हमसब यह भूल जाते हैं कि जिस प्रकार जन्म देने वाली माता के प्रति हमारा कुछ कर्तव्य बनता है, ठीक उसी प्रकार मातृभूमि व मातृभाषा को लेकर भी हमारे अपने कर्तव्य हैं जिन्हें पूरा करना हमारा उतरदायित्व है। आज चंद लेखकों,पत्रकारों व वयोज्येष्ठों को छोड़कर कोई हिंदी में संवाद करना नहीं चाहता है क्योंकि इसमें उनके सम्मान की हानि होती है। पर क्या यह सोच सही है? अपने देश में, अपनी मातृभाषा में बात करने से क्या सही में हमारे सम्मान की हानि होती है ? अगर इसका जवाब हां है तो समझ लीजिए कि हम आज भी गुलाम हैं। अंग्रेजों के सभ्यता-संस्कृति व भाषा के गुलाम और अब समय आ गया है जब हमें इन गुलामी की जंजीरों को तोड़कर अपनी मातृभाषा का परचम सारे जग में लहराना होगा। जब तक हमारी मातृभाषा सशक्त नहीं होगी तब तक हम भी सशक्त व आत्मनिर्भरशील नहीं बन सकतें और बिना आत्मनिर्भरता के विकास असम्भव है।

चूंकि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है अतः  बोझिल मन से हर वर्ष हमारे देश में निरस भाव के साथ अंग्रेजी के सौतेले बेटों से आंखें चुराकर हिन्दी दिवस मनाई जाती है। सितम्बर महीने के १४ तारीख को हर वर्ष बड़े-बड़े भाषणों, एकाध कविता पाठ व भजन के कार्यक्रम के साथ हिन्दी दिवस की औपचारिकता पूरी कर ली जाती है । पर अपनों के द्वारा छली गई हिंदी पहले की ही भांती चरम उदासीनता का शिकार बनी रहती है।

अब समय आ गया है जब हम सब को मिलकर हिंदी भाषा को संसार की सबसे समृद्ध व आदर्श भाषा के तौर पर स्थापित करना होगा। अब समय की सूई को घुमाकर हिंदी के प्रभाव वाले समय के सृजन की आवश्यकता है और इसकी शुरूवात हमें अपने घर से ही करनी होगी। हमें अपने बच्चों को अपनी भाषा से प्रेम करना सिखाना होगा। उन्हे जापान,चाईना,कोरीया जैसे देशों से सीख लेने की प्रेरणा देनी होगी। हमें भारतवर्ष को विश्वगुरु बनाने के प्रण को दोहराते हुए उन्हे अपने स्वाभिमान को जगाने की भी सीख देनी होगी। और देश का स्वाभिमान जगेगा मातृभाषा के सम्पन्न होने से और मातृभाषा की सम्पन्नता आएगी निसंकोच उसके व्यवहार से। हमें अपनें बच्चों को बताना होगा कि जिसे हम अपना समझ गले लगाये बैठे हैं वो असल में हमारी सौतेली मां है, वह सौतेली मां जो चुपचाप से हमें बिन बताये हमारा शोषण कर रही है। हमें आत्मकेन्द्रिक बनाने के बजाय हमें परनिर्भरशील बना रही है। जिसके फल स्वरूप हम आज भी मानसिक तौर पे अंग्रेजों के या यूं कहें कि पश्चिमी सभ्यता के गुलाम बन रहें हैं। जो देश कभी सोने की चिड़िया हुआ करता था आज वह देश अपने को सक्षम प्रमाणित करने की अथक चेष्टा कर रहा है। हमें देश सशक्त बनाने के लिए अपने नींव को सशक्त बनाना होगा और नींव को सशक्त बनाती है सशक्त मातृभाषा।
अतः इस वर्ष हमें हिन्दी दिवस के इस शुभ घड़ी में खुद से प्रण करना होगा कि अब हम अधिक से अधिक हिंदी भाषा का प्रयोग करेंगे। हम हिंदी के उत्थान के लिए हर सम्भव प्रयासरत रहेंगे और पूरे गर्व के साथ हिन्दी को अपनी मातृभाषा के रूप में स्वीकारेंगे। अब से हमारा एक ही उद्देश्य होगा,अपनी प्यारी हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय दरबार में समृद्ध एवं सम्पन्न भाषा के रूप में स्वीकृति दिलाने की।

 मुकेश सिंह

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