इज्जत को किया तार तार…

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जला डालों गर जगदम्बा सीता की इज्जत को किया तार तार
वरना बताओं राम क्यों हर बार मेरी इज्जत पे किया तुमनें वार

क्यों अब चित्रपट पर दुशासनो को कोई भी नहीं जलाता है
मेरा उद्देलित मन पूछता,क्यों उल्टे मेरे लिए है सबके विचार

मेरे दस के दस चेहरे दुनियां के सामने ही रख दिये थे मैंने
नहीं पराई स्त्री को देख कभी ललचाई वासना भरी थी लांर

फ़िर क्यों सीता हरण की पीर युगों युगों से मैं सहता आय हूँ
जब प्रभु श्रीराम ने ही स्वयं दिखलाया मुझको मोक्ष का द्वार

बतलाओ क्यों नहीं दहेज के दानव को तुम हर बार जलाते हो
मुझे जलाते हो तब मैने बहना की इज्जत पे वारा सारा परिवार

दो चार पैग लगाकर जो बड़े आदर्शवादी बनते है आकर के
उनसे पूछ रहा कितने राम तुम में हो जो मुझे जलाते हो यार

पत्नी हो या बहन की सहेली तुम तो सैक्स ही ढूंढते हो सदा
पत्नी आने पर परिवार में ही कर देते हो तुम तो हमार तुम्हार

कभी गर्भ में ही मार देते हो नन्ही चिड़ियों को क्यों तुम भी
कभी दरिंदगी की हद में जाकर चैक करते हो उनका कौमार

हाँ मैं रावण ही ठहरा जला डालों आज अपने हाथों से तुम
राम राज्य में सीता असुरक्षित देख बह गई है अश्कों की धार

मन कुंठित है आज मेरा की क्योँ मैं रावण बन पैदा हुआ था
मैं तो सदियों तक जलूँगा ये सोच दुशासन नहीं बन्द कारागार

सब जानते मुझकों की मैं रावण हूँ यही है प्रमाण पत्र मेरा
खुले घूमते दुरयोधन व दुशासन तो मुझे है धिक्कार धिक्कार

अशोक सपड़ा की क़लम से

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