इसी आस की अभिलाषी

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आ जाओ मेरे चन्दा मैं हूँ निर्जल भूखी प्यासी ।
तेरी उमर बढ़े युग युग तक, इसी आस की अभिलाषी ।।

सखी सहेली ननद जेठानी के पति मिलने आये हैं ।
पत्नी को जलपान कराकर, निर्जल व्रत खुलवाये हैं ।।
बस तुझको छू लेने को ज्यों तरस गयी मैं विरहा -सी ।
इसी आस की अभिलाषी मैं इसी आस की अभिलाषी ।।

मैं भी तेरे इन्तजार में, सज धज कर शर्माती हूँ ।
मन में उठते हर सवाल को मन ही मन सुलझाती हूं ।।
मेरे प्रियवर देर न कर श्रृंगार न हो जाये बासी ।
इसी आस की अभिलाषी मैं इसी आस की अभिलाषी ।।

लुढ़क रहे नैनों के काजल, गुमसुम पायल रोती है ।
होठों की लाली मुरझाकर, आकर्षण को खोती है ।।
छोड़ छाड़ परदेश सजनवा याद करो पावन काशी ।
इसी आस की अभिलाषी मैं इसी आस की अभिलाषी ।।

तारों के ताने माथे की बिन्दी को ललचा जाते ।
उलझ उलझ कुंतल सँग कुंडल, दुख को और बढ़ा जाते ।।
तेरे आने से भागेंगे व्यंग्य बोलते कटु भाषी ।
इसी आस की अभिलाषी मैं इसी आस की अभिलाषी ।।

मेरा मन तुझको पहचाने, नहीं बूझते हो पीड़ा ।
जिस सौतन ने बाँधा तुझको, पड़ जाये उसको कीड़ा ।।
तुम भोले मैं भी हूँ भोली, भोले बाबा की दासी ।
इसी आस की अभिलाषी मैं इसी आस की अभिलाषी ।।

अवधेश कुमार अवध

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