जाडे़ के दोहे

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sharad
जाडे़ ने ढाया कहर,मचा हुआ कुहराम।
सूरज ढीला पड़ गया, बंद हुए सब काम ।।

सकल दिवस कुम्हला गया, शिथिल पड़ गया ताप।
जाड़े की विकरालता, कौन सकेगा माप।।

जाड़े ने हमला किया, घायल हर इंसान ।
इस मौसम में बढ़ गई, गर्म पेय की शान ।।

ऊनी वस्त्रों का बड़ा,आज ‘शरद’ फिर मान ।
शीतलता हरसा रही,गर्मी का अवसान ।।

सन्नाटा  दिखने लगा, सड़क आजकल रात।
कम्बल,ऊनी भा रहे ,बन करके सौगात।।

कोल्ड ड्रिंक बेकार हैं,भाव पा रही चाय।
जाडे़ से बचकर रहो, यही ‘शरद’ की राय।।

ज़ल्दी होती रात है,देर हो रही भोर।
बिस्तर भाता है बहुत,सो लो प्रिय बिन शोर।।

सूरज भी घबरा रहा,देख शीत-आवेग।
उसको भी घायल करें,चलित वायु के तेग।।

कान बंधे,काया ढंकी,उघड़ा ना ही अंग।
हर इक भौंचक है ‘शरद’,देख शीत के ढंग।।

फसलों पर पाला गिरा,रोता दीन किसान।
जाड़े में जीना ‘शरद’,किंचित ना आसान।।

जाड़े की प्रतिकूलता,कौन सकेगा माप।
जाड़े सचमुच दोस्तो,आज एक अभिशाप।।

– प्रो.शरद नारायण खरे

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