जल चूक चला

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प्राणी   महिमा  मद  मोह  भरा ।
सारा   अपना  पन  छोड  धरा।।
आत्मा लतिका रस सोख चुकी ।
देही   सरिता   मग  तोड  चुकी  ।।

पाया धन नाशक जोश नया ।
छाया मन भावन शौक नया ।।
देखो  मन  चंचल  चाहत हैं ।
अंधे  पथ   रंजन  आदत हैं ।।

संसार मिला सुख सार कहां ।
भंगूर  सदा  मन  पास  रहा ।।
हे प्राण सुनो कुछ भान करो ।
मैं आस करूँ सिर हाथ धरो ।।

हैं नाश वहां  मद जोश  भरा ।
हैं काम भला सत नाम धरा।।
स्वीकार करो प्रिय साथ मिले ।
रफ्तार  चलों सुख सार मिले ।।

पाया रजनी तम मोह घना ।
भाया करनी यश लोभ सना।।
नेही विरही मन आस करे ।
देही नित ही पद चाप भरे ।।

मैं दीपक लौ नित मौत जलूँ।
हे प्रीतम नीरव  बोल पलूँ ।।
संकेत करो तुम जीत गये ।
अंदाज मिले कब रूठ गये ।।

होते  तुम   अंतर  रूप   वही ।
आओ प्रिय स्वागत धाम वही ।।
छोडो   अब  आदत रोष भरी ।
मैं   प्रेम   पुजारन    देव  परी ।।

आँसू बन मिला चित धार बहा ।
पीडा मन बसा मित रूप सहा ।।
ये दीप करुणा  रस  तेज जला ।
मैं नाथ सरिता  जल चूक चला ।।

छगन लाल गर्ग ‘विज्ञ’ ।
आबूरोड, राजस्थान ।

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