जल रहा हूँ रात दिन

0
89

मैं सनातम बचाने की ख़ातिर ,जल रहा हूँ रात दिन
हिन्दू कहलाता हूँ तो लोगों को ख़ल रहा हूँ रात दिन

स्वामी दयानंद को याद कर के ललकारा हूँ आज मैं
सावरकर के गीतों को ही सुनकर पल रहा हूँ रात दिन

नागार्जुन और निराला के वो लेख जो पढ़े बचपन में
विदेशी संस्कृति से देखिये तो ज़रा छल रहा हूँ रात दिन

क़सम तुझे लेखनी की क़लम तू सूरदास तुलसी याद कर
शहीदों की मृत्यु के त्यौहार मनाने को मचल रहा हूँ रात दिन

देखा जाये तो हमकों तो राम कृष्ण की जयकार करनी है
मौक्ष पाने को देख ज़रा ,मैं दीवाना पगल रहा हूँ रात दिन

विदेशीराज की सत्ता कभी हमकों मंजूर ना होगी साथियों
मैं हिंदु नहीं आस का सूरज हूँ और ढल रहा हूँ रात दिन

अशोक के सर माँ भारती के दूध का ऋण सदा ही रहेगा
हिंदुत्व पाने की ठानी तो मंजिल को चल रहा हूँ रात दिन

हाथ बांधकर सरकार ख़डी रहती है तमाशबीनों की तरह
हिन्दू वो नहीं जो ज़ुल्म देख कहें हाथ मल रहा हूँ रातदिन

अशोक सपड़ा की क़लम से दिल्ली से

LEAVE A REPLY