जंगल में अपना एक घर मैं भी बनाने चला हूँ-अशोक सपड़ा

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जंगल में अपना एक घर मैं भी बनाने चला हूँ  unnamed-3
बारिश के बाद तिनका तिनका जुटाने चला हूँ
जो उजाड़ देते है आशियाना किसी का दोस्तों
तिनका तिनका घोसलों का मैं गिनवाने चला हूँ
घर क्या है देखो बेघर रहने वालो की आँखो में
क़ैद में रहते परिंदों तुम्हारी सरहदें मिटाने चला हूँ
बढ़ती जरूरतों में कटौती जिंदगी की क्यों यारों
परिवार में आज मैं भी थोडा समय बिताने चला हूँ
मेरी पाठशाला का मूल ,किताबे नहीं प्रेम है बस
इस समूची देह में प्रेम की थिरकन दौड़ाने चला हूँ
मैं हारता नहीं कभी युद्ध और मौसम की मार से
जंगल में मनुष्य और जानवरों को समझाने चला हूँ
सब कामों को छोड़कर जुटाई है आसमाँ पे खेती
टूटते अल्फाजों से आज कविता नई बनाने चला हूँ
अशोक सपड़ा बदनसीब की कलम से

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