जीवन के दोहे

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जीवन मुरझाने लगा,
ऐसी चली बयार !
स्वारथ मुस्काने लगा,
हुआ मोथरा प्यार !!
बिकता है अब प्यार नित,
बनकर के सामान !
भावों की अब खुल गई,
सुंदर बड़ी दुकान !!
सब ही अपने में घिरे,
त्याग दिये सब त्याग !
कैसे होगा फायदा,
ख़ूब गुणा औ’ भाग !!
अंधकार से दोस्ती,
सूरज को धिक्कार !
सच्चे का मुंह स्याह कर,
करें झूठ जयकार !!
चहरों पर परतें चढ़ीं,
असलीपन सब लुप्त !
परसेवा के नाम पर,
है हर इक अब सुप्त !!
शेष नहीं संवेदना,
निष्ठुर आज समाज !
नेह,प्रेम,करुणा नहीं,
करे कपट अब राज !!
                 -प्रो.शरद नारायण खरे
                      विभागाध्यक्ष इतिहास
 शासकीय जे.एम.सी.महिला महाविद्यालय
       मंडला(म.प्र.)-481661

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