जीवन की सचाई…

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क्या पता कहां
कितने दिन
कहानी लिखी पढ़ी जानी है!
किरदार बन कर रह गए है
देख लिया है हमने
जिंदगी आनी-जानी है!
कल वो-
आज यह,
खुद पर भी यह नौबत आनी है!
सबको सुना,
देखा
और दिलासा दिया किए
ये कहानी हम पर भी लिखी जानी है!
यहां कौन रह सका!
इस नश्वर काया के साथ हमेशा
ये जिंदगी है दोस्त,
मौत एक
 दिन सबको आनी है!

प्रीति वंजारी, नई दिल्ली

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