कन्या भ्रूण हत्या…

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कहीं बेटीकहीं बहानाकहीं बीवीकहीं हूं मां,

मैं रिश्तों का वो संदल हूंमैं खुशबू का घराना हूं images

 

मैं मेहमां हूंपरिंदा हूंपड़ोसी का वो पौधा भी

क्यूं माना मुझको बर्बादीगमों का क्यूं तराना हूं

 

सुबह हूंरात हूंगुल हूंजमी मैंआसमा भी मैं

मैं सूरज-चांद-तारा हूंमैं दुनियामैं जमाना हूं  

एक बेटी की अंतरात्मा से निकली इस आवाज़ को सुन पा रहे हैं आप? अगर नहीं तो आपकी इंसानियत मर चुकी है और आपको मनुष्य कहलाने का हक़ नहीं है. एक नारी के रूप में मैंने इस दर्द को सहा अहै और जानाति हूँ कि कोख में पल रही कन्या भ्रूण ह्त्या से पहले किस तरह की सोच रखती है:

“मैं एक भ्रूण हूं। अभी मेरा कोई अस्तित्व नहीं। मैं प्राकृतिक रूप से सृष्टि को आगे बढ़ाने का दायित्व लेकर अपनी मां की कोख में आई हूं। अब आप पहचान गए होंगे कि मैं सिर्फ भ्रूण नहीं बल्कि कन्या भ्रूण हूंबालक भ्रूण होती तो गर्भ परीक्षण के बाद मुझे पहचाने जाने का स्वागत होता जय श्री कृष्ण‘ के पवित्र सांकेतिक शब्द के साथ । मगर मैं तो कन्या भ्रूण हूं नामेरे लिए भी कितना प्यारा पावन सांकेतिक शब्द है जय माता दी। पर नहीं मेरे लिए यह शब्द खुशियों की घंटियां नहीं बजाताजयकारे का उल्लास नहीं देता क्योंकि इस शब्द‘ के पीछे लाल‘ खून की स्याही से लिखा एक काला‘ सच है जिससे लिखी जाती है मेरी मौत।“  

“कैसी घोर विडंबना है ना जिस देवी को स्मरण कर मुझे पहचाना जाता हैउसे तो घर-घर सादर साग्रह बुलाया जाता है। और मैं उसी का स्वरूपउसी का प्रतिरूपमुझे इस खूबसूरत दुनिया में अपनी कच्ची कोमल आंखे खोलने  से पहले ही कितनी कठोरता से कुचला जाता है। क्यों ????

कन्या भ्रूण हत्या को लेकर चाहे लाख क़ानून बने लेकिन कठोर सच्चाई यही है कि आज भी डाक्टरों और अधर्मी समाज के ठेकेदारों की मिलीभगत से कन्या भ्रूण हत्या का सिलसिला बदस्तूर जारी है.

सरकार जनसंख्या को नियंत्रित करना चाहती है। इसलिए उसका नारा है हम दो हमारे दो। शोधकर्ताओं का कहना है कि पृथ्वी में मौजूदा जनसंख्या का 200,000 गुणा भार उठाने की क्षमता है। फिलहाल संसार की जनसंख्या 6.5 बिलियन है। यानी जमीन पर 13 लाख बिलियन लोग रह सकते हैं। इसलिए जनसंख्या विस्फोट कोई बड़ी समस्या नहीं है। समस्या यह है कि इस बढ़ती आबादी में औरत के लिए जगह नहीं है।

लिंगानुपात में इतना असंतुलन आता जा रहा है कि सरकार ने अब सड़कों पर यह बोर्ड लगाने शुरू कर दिए हैं- जब एक महिला के होंगे पति चार/ तब कहाँ मिलेगा पत्नी का प्यार। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सुखसमृद्धि और बेहतर जीवन शैली के लिए छोटा परिवार होना चाहिए। लेकिन यह बात भी अपनी जगह सही है कि जनसंख्या वृद्धि को कुछ जरूरत से ज्यादा ही महत्वपूर्ण व चिंताजनक बना दिया गया है। खासकर इसलिए भी क्योंकि दुनिया भर में फर्टिलिटी में पतन हुआ है। जनसंख्या विकास दर में जबर्दस्त कमी आई है। दो दशक पहले संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि 2050 तक संसार की आबादी 11.16 बिलियन हो जाएगी। लेकिन अब फर्टिलिटी व विकास दर में कमी को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2050 तक दुनिया की जनसंख्या 9.37 बिलियन ही हो पाएगी और 11.5 बिलियन होने पर मानव आबादी में स्थिरता आ जाएगी। 

 दरअसलजनसंख्या का भय हमें इसलिए सताता है क्योंकि हम भविष्य का आकलन आज की तकनीक व जीवनशैली के आधार पर करते हैं और ऐसा करते समय हम यह भूल जाते हैं कि अब से पचास बरस बाद जरूरत के हिसाब से तकनीक में भी विकास आ जाएगा। जबकि तकनीक का विकास विरोधाभास से खाली नहीं है। यह तकनीक की ही वजह है कि पिछले बीस वर्षों के दौरान अकेले भारत में एक करोड़ कन्या भ्रूणों का कोख में ही कत्ल कर दिया गया है। ऐसा लांसेट‘ में प्रकाशित एक शोधपत्र में कहा गया है। 

 कानून और इस संदर्भ में कोशिशें इसलिए कामयाब नहीं हो रहीं क्योंकि अभी तक समाज में महिला को पुरुष के बराबर दर्जा ही नहीं मिला है। जब तक हमारी इज्जत और बेइज्जत का पैमाना औरत और उसकी वर्जिनिटी से जुड़ा रहेगातब तक औरत को बराबरी का मुकाम हासिल नहीं होगा। 

जब तक समाज में लिंग बराबरी नहीं आएगीतो लड़के की चाहत में आबादी भी बढ़ती रहेगी 

काश गर्भस्थ शिशु बोल सकतायदि वह बोलता तो शायद वह अपने शरीर को चीरते औजारों को रोक सकता और कहता माँमुझे भी जीना है।‘ लेकिन शायद उस वक्त भी उसकी आवाज को वो निर्दयी माँ-बाप नहीं सुन पातेजो रजामंदी से उसकी हत्या को अंजाम दे रहे हैं। मेरा यह प्रश्न उन सभी लोगों से हैजो कभी न कभी कन्या भ्रूण हत्या के जिम्मेदार रहे हैं।  

बालिका परिवार के आँगन का वो नन्हा सा फूल हैजो उलाहना के थपेड़ों से बिखरता हैत्याग की रासायनिक खाद से फलता-फूलता है फिर भी दुःख रूपी पतझड़ में अपने बूते पर खड़ा रहता है। बालिकाजिसके जन्म से ही उसके जीवन के जंग की शुरुआत हो जाती है। नन्ही उम्र में ही उसे बेड़ियाँ पहनकर चलने की आदत-सी डाल दी जाती है। येन केन प्रकारेण उसे बार-बार याद दिलाया जाता है कि वह एक औरत हैउसे सपने देखने की इजाजत नहीं है। कैद ही उसका जीवन है।  

 हमें यह सोचना चाहिए कि विकास के सोपानों पर चढ़ने के बावजूद भी आखिर क्यों आज इस देश की बालिका भ्रूण हत्याबाल विवाहदहेज मृत्यु के रूप में समाज में अपने औरत होने का दंश झेल रही है?

लोगों के सामने तो हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं कि बालिका भी देश का भविष्य है लेकिन जब हम अपने गिरेबान में झाँकते हैं तब महसूस होता है कि हम भी कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसकी हत्या के भागी रहे हैं। यही कारण है कि आज देश में घरेलू हिंसा व भ्रूण हत्या संबंधी कानून बनाने की आवश्यकता महसूस हुई।

अशिक्षित ही नहीं बल्कि ऊँचे ओहदे वाले शिक्षित परिवारों में भी गर्भ में बालिका भ्रूण का पता चलने पर अबार्शन के रूप में एक जीवित बालिका को गर्भ में ही कुचलकर उसके अस्तित्व को समाप्त किया जा रहा है। हालाँकि भ्रूण का लिंग परीक्षण करना कानूनी अपराध परंतु फिर भी नोटों व पहचान के जोर पर कई चिकित्सकों के यहाँ चोरी-छिपे लिंग परीक्षण का अपराध किया जा रहा है।  

आज कई जातियों में ये स्थितियाँ बन रही हैं कि वहाँ लड़के ज्यादा और लड़कियाँ कम हैं इसलिए मजबूरन उन्हें दूसरी जाति में अपने लड़के का रिश्ता तय करना पड़ रहा है।यदि आज यह स्थिति है तो कल क्या होगायह तो सर्वविदित है। यदि हम अब भी नहीं जागे तो शायद बहुत देर हो जाएगी और प्रकृति के किसी सुंदर विलुप्त प्राणी की तरह बेटियों की प्रजाति भी विलुप्ति के कगार पर पहुँच जाएगी।

बेटियाँ भी घर का चिराग हैं। वे भी एक इनसान हैंजननी हैंजो हमारे अस्तित्व का प्रमाण है। इसकी रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है इसलिए आज ही संकल्प लें और कन्या भ्रूण हत्या पर अंकुश लगाकर नन्ही बेटियों को भी जीने का अधिकार दें। 

 * धनी व शिक्षित परिवार में पहली संतान बेटी है तो गर्भपात की घटनाएँ अधिक हैं।

 * कन्या भ्रूण गर्भपात 80 के दशक में 2 लाख90 के दशक में 12 से 40 लाख और 2000 के दशक में 31 से 60 लाख हुए।

 * पहली संतान बेटी है तो लिंगानुपात में गिरावट शहरों में ग्रामीण क्षेत्रों से ज्यादा रही। 

 karuna jha , nepal

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