कविता -डॉ० मंजु श्रीवास्तव

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पिता,
तुम मेरे जीवन के वृत्त हो।   FB_IMG_1488453522507
जन्म के बाद
जिस बिन्दु से
चलाया था
मुझे मेरी उँगली पकड़कर।
मैं चल पड़ी
तुम्हारे निर्दिष्ट मार्ग पर।
धीरे धीरे चलने लगी
अपने पैरों पर खड़े होने तक
तुम मेरे आगे आगे चलते रहे
सुरक्षा कवच बनकर।
जब स्वयं चलने लगी
छोड़ दी मेरी उँगली
मैं आगे बढ़ती रही
नित नई राह पर
चलती रही
फिर भी हर पल अचेतन में
तुम्हरी शिक्षाएं, तुम्हारी वर्जनाएं,
व्यंग्य में मुस्कातीं
स्नेह बरसाती,
जागरूक वो ‘दो आँखें’
चलती रहीं साथ साथ
मार्ग सुगम बनाने को
पल पल तत्पर।
एक दिन दृष्टि धुँधला गयी
शक्ति कम होने लगी
उभर आईं मेरे प्रति
असुरक्षा की चन्द लकीरें
थके चेहरे पर।
घबरा कर पकड़ा दी
मेरे जीवन की डोर
दो बलिष्ठ हाथों में
दे दिया मजबूत संबल
साथ चलने को
फिर भी
मेरे मन के कोने में
तुम सदा प्रथम पुरुष ही रहे।
वृत्त अंतर्मुख होकर समाता रहा।
संसार के लिए तुम अदृश्य हो गये
पर मेरे भीतर जीते रहे
नित्य, निरन्तर
निर्विकार, सशरीर
लौट उसी बिन्दु पर।
डॉ० मंजु श्रीवास्तव
एसोसिएट प्रोफेसर
डी 108 श्याम नगर
कानपुर 208013

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