कविता-रीता यादव

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घोर कलयुग लिया पनाह हैl  14141893_193321317748631_519645184695496348_n
अच्छाई ही बड़ा गुनाह है l
अच्छे बुरे का भेद नहीं,
बुराई करके खेद नहीं ,
अच्छाई दर-दर ठोकरें खाती हैl
बुराई मौज मनाती हैl
सत्य यहां स्वीकार नहीं ,
झूठे को धिक्कार नहीं,
सत्य साबित कर कर के थक जाता है l
झूठ इस कदर हावी है, कि सत्य नहीं कोई सुन पाता है l
सत्य बेचारा इस कलयुग में तड़प-तड़प मर जाता है l
झूठ गर्व से अपने झूठे शीश को तनकर उठाता हैl

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