काव्य संग्रह “हम ढलानों पर खड़े हैं” इन्द्रधनुष की भांति है जिसमें ब्रह्मांड के सारे रंग हैं।

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समीक्षक- गोपालदास नीरज

बेहद खूबसूरत कलेवर में है डा0 चन्द्रपाल मिश्र गगन द्वारा रचित काव्य संग्रह हम ढलानों पर खड़े हैं। डॉ0 गगन उस कहावत को चरितार्थ करने वाले साहित्यकार हैं कि सौ सुनार की एक लुहार की। जहां तक ज्ञात है डॉ0 गगन की एक अन्य कृति संकेत संभावनाओं के का विमोचन जिला औद्योगिक एवं कृषि विकास प्रदर्शनी एटा में आयोजित हुए अखिल भारतीय कवि सम्मेलन के गरिमामयी मंच से मेरे ही हाथों से सम्पन्न हुआ था। उस संकलन के बाद हम ढलानों पर खड़े हैं जब मेरे हाथों में है तो मैं बहुत आश्चर्य चकित हूँ डॉ0 गगन जैसा साहित्यकार कासगंज जैसे तृतीय श्रेणी के शहर में कोयले की खान में चमकते हीरे के समान है।
आपका काव्य संग्रह इन्द्रधनुष की भांति है जिसमें ब्रह्मांड के सभी रंग हैं। साहित्य की दृष्टि से रसों से युक्त, छंदों के प्रयोग, बिम्ब विधानों की छटा, अलंकारों से परिपूर्ण और संगीत के सुरों का आनन्द हृदय और मन को प्रदान करने वाला है। अपनी लम्बी साहित्यिक यात्रा में मैंने अनेक संग्रह देखे और पढ़े परन्तु हम ढलानों पर खड़े हैं मेरे मन मस्तिष्क पर एक अलग ही छाप छोड़ने में सफल रहा है।
यह काव्य सकलन अयन प्रकाशन , 1/20 महरौली, नई दिल्ली-110030 , द्वारा प्रकाशित प्रथम संस्करण है । हिन्दी साहित्य के महानतम आलोचकों में शुमार डॉ0 रामरजपाल द्विवेदी द्वारा लिखित इस संकलन की भूमिका ऐतिहासिक है, और विनम्र भाव से कवि द्वारा  लिखा गया आत्म कथ्य पाठक को काव्य संकलन पढ़ने को मजबूर करता है।
चार खंडों में विभक्त इस संग्रह का प्रथम खंड खड़ी बोली को समर्पित है। भाषा की दृष्टि से मजबूत इस खंड में कवि ने मनोविज्ञान के तत्वों को वांचने का काम किया है। आदमी की आंतरिक और वाह्य शक्तियों को मनोवैज्ञानिक ढंग से पढ़ने का काम किया है। खड़ी बोली में छंद लिखने की अद्भुत कला के दर्शन होते हैं आपकी रचनाओं में। कवि ने मन की शक्ति को मनुष्य और मनुष्यता दोनों के लिए रामवाण बताया है –“मन की लगन यदि आदमी के साथ हो तो किसी अन्य शक्ति का न योगदान चाहिए”। कवि का मन कार्ल मार्क्स की साम्यवादी विचाधारा से प्रेरित है, मजदूर की मेहनत का अपेक्षित मूल्य न मिल पाना कवि को पीड़ित करता है।
” मजबूरियों से जूझता ही  रहे  मजदूर,
मन की व्यथा का भार लिए हुए घूमता।”
संग्रह का द्वितीय खंड कवि ने ब्रज भाषा को समर्पित किया है। ब्रज भाषा में रचित छन्द कालजयी कहे जाएंगे। ब्रज भाषा में आमतौर पर कवि कलम कम चला रहे हैं और ब्रज भाषा नए साहित्यकारों से दूरी बनाती जा रही है, ऐसे में डॉ0 गगन के ब्रज भाषा में लिखे गए छन्दों ने उन्हें बहुमुखी मानने पर विवश कर दिया है। डॉ0 गगन श्रृंगार के चतुर चितेरे हैं। श्रृंगार हृदय के स्पंदन से पैदा होता है, श्रृंगार रस से ओत प्रोत रचनाएं कवि के कोमल हृदय की कहानी व्यक्त करती हैं। आमतौर पर जनमानस की यह धारणा है कि कवि जो अनुभव करता है वही सृजित करता है, तो स्पष्टतया कहा जा सकता है कि कवि के हृदय में प्रेम की पंखुड़ियां महकती हैं।
” खौरि-खौरि राधा फिरै होरी खेलिवे के काज,
झूमि – झूमि, घूमि-घूमि रंग बरसावती
रुकि, झुकि, मुरिजात, दुरिकैं निकस जात ,
श्याम ठाडौ रहिजात हाथ नहिं आवती।। ”

तृतीय खंड में गीत व ग़ज़लें रखी गयी हैं। कवि के गीत और ग़ज़लें दोनों ही नए जमाने की नई सोच को आगे ले जाने वाली दुपहिया हैं। कवि ने बार बार व्यवस्था पर प्रहार किया है। कवि सामाजिक/सांसारिक व्यवस्था से खिन्न है, आक्रोशित है ।
“प्रजातंत्र में अभिशापित अधखिले सुमन मसले जाते हैं। / चौराहे पर,लुटी बालिका से मौलिक अधिकार न पूछो।”                                                                                          अतिमहत्वपूर्ण यह है कि पुस्तक का शीर्षक कवि ने ग़ज़लों के फलक से तोड़ा है, चूंकि कवि की रचनाएं इंगित करती हैं कि मनुष्य की स्थिति सामाजिक परिवेश में ढलानों पर खड़े व्यक्ति की तरह हो गई है, अगर वह खुद संतुलन स्थापित न करे तो उसका अस्तित्व खतरे में है क्योंकि ढलानों के नीचे तो गर्त/ गड्ढा है। ढलानों पर ऊपर जानें में भी सांस फूलती है और नीचे उतरने पर फिसलने का डर, और सबसे ज्यादा कठिन काम खुद को संतुलन के साथ ढलानों पर खड़े रखना है। गिरते सामाजिक मूल्य और संबंधों में हो रहे बिखराव को शीर्षक में बांधने का कवि ने सफल प्रयास किया है।
” जागकर देखा यह हमने रीतियाँ कुछ और हैं।
हम ढलानों पर खड़े हैं सीढियां कुछ और हैं।।”
चतुर्थ और अंतिम खंड को नई कविता का नाम दिया जाना उचित रहेगा। इस खंड की समस्त रचनाएं आपसी सामाजिक तथा जागतिक संबंधों का भौतिक विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं। आज के कटु- तिक्त यथार्थ जिससे बचा नहीं जा सकता, को भी स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती हैं।
“जब उतरती/ व्यवहार की धरती पर/कुटिलता/
आत्मीयता की पोशाक में/ सज -संवर कर /
मंद-मंद/ मुस्कान के लिए”
इस खंड की सभी रचनाएं चिंतन के नए द्वार खोलती सी प्रतीत होती हैं। कुछ रचनाओं में गीतात्मक सौंदर्य की भी सृष्टि कवि ने की है। ये रचनाएं नई कविता की एक नई कड़ी के रूप में याद की जाएंगी।
डॉ0 गगन के काव्य संग्रह की एक एक रचना चमकते मोती के सदृश है और पूरा काव्य संग्रह हम ढलानों पर खड़े हैं  एक मुक्ताहार की भांति है जिसे हर पाठक अपने कंठ में सुशोभित करने की चाह रखेगा ऐसा मेरा विश्वास है। असीम शुभकामनाएं

                 गोपालदास नीरज
            जनकपुरी, मैरिस रोड
                  अलीगढ़(उ0प्र0)

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