केवल शब्द

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नहीं चलते अब मनन चिन्तन
कि बन सके कोई युग सार्थक सिद्धांत
या कि धरातल पाये जिन्दगी
अब होता हैं व्यापार भावनाओं का
शब्दों के उतार चढ़ाव
हुनर पाये लोगों से फिसलन पा जाते
सारे मनोरथ अर्थो के हित लिए
यही समझ देते हैं शब्द
नहीं बहती अब गीता
या कि इंसानियत लिपटी भाव धारा
पावन हो सके मानव चित
अब युगों से बहती पावन गंगा
अब अति स्थूलता से गंदी बहती हैं
शब्दों की नदी
बाढ़ बनी बहाती जाती इन्सानियत
ओर मूक हुआ आम
कातर हुआ जी रहा दहशत भरी जिन्दगी
नहीं होता अब मनन परहित
स्वार्थ की राह बहते जाते शब्दों के प्रवाह
लगता हैं विवेक अपनी उम्र
व्यतीत कर चुका
पर अभी बिता कहां समय का अस्तित्व
चेतन हुआ मैं शब्द घेरने लगा ।


छगन लाल गर्ग “विज्ञ”!

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