क्रोध-वरदान अथवा अभिशाप

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rajeshwar
ईश्वर की विश्व रुपी रचना में विभिन्न तरह के मानव, पशु पक्षी जल चर व नभचर प्राणी है। प्रत्येक को एक अवभूत शरीर ईश्वर ने प्रदान किया है उसमें कुछ विशेषतायें है और कुछ कमियाॅं भी हैं कोई प्राणी पूर्ण नहीं हैं। प्रत्येक को शरीर जन्म, मृत्यु, भूख आदि संवेग समान रुप से है।
मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा जाता है और वो है भी उसकी ईश्वर ने बहुत सी विशेषताओं से नवाजा है। उसका विश्व वर्णन पुराणों आदि में दिया है उसको पांच ज्ञानेन्द्री, पांच कमेन्द्री प्रदान की गई इसके अलावा उसे कुछ संवेदनायें भी प्रदान की गई जिसमें प्यार, वात्सल्य, अहंकार, सुख-दुख प्रतिशोध व क्रोध अथवा गुस्सा भी प्रमुख है। इन सभी संवदेनाओं को नियमित करने को मनुष्य को बुद्धि प्रदान की गई है परंतु ये संवेदनायें कई बार बुद्धि के नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं और अर्थ के स्थान पर अनर्थ की ओर अग्रसर हो जाती है। विभिन्न संवदेनाओं पर बहुत साहित्य उपलब्ध है परंतु क्रोध पर बहुत कम मात्रा के ज्ञान उपलब्ध है अतः हम उसी पर आगे चर्चा करेंगे। क्रोध और गुस्से को हम समानार्थ मानते हैं परंतु ऐसा है नही। हिंदी भाषा की सुंदरता और श्रेष्ठता ही यही है कि इसमें हर एक संवेदना के विभिन्न रुपों के लिये विशेष शब्दों की रचना की गई जो लगते और आम भाषा में समान हैं परंतु वास्तव में विभिन्न परिस्थितियों को इंगित करते हैं।
क्रोध हमारी नैसर्गिक एक मुख्य संवेदना है और परिस्थिति अनुरुप उसका उपयोग ही यह सिद्ध करता है कि यह अभिशाप है या वरदान। क्रोध का संबंध हमारी बुद्धि व आत्मा से है और यह हमारी एक सकारात्मक शक्ति है और इसका उपयोग एवम् समाज परिवार या देश के हितार्थ किया जाता है जबकि गुस्सा, क्रोध के विपरित स्वार्थपूर्ति डराने व किसी सच को दबाने के लिये उपयोग में लाया जाता है गुस्से का अर्थ है प्रतिशोध, आधिपत्य व स्वार्थ यह अलग बात है कि इन दोनों के जो क्रिया या कर्म होते है वो लगभग समान होते और दिखते है और देखने वालों को इन अंतर में छिपा होता है।
क्रोध व गुस्से के कारण समान होते है लेकिन होते अवश्य है। किसी अतः इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिये कि क्या ये वरदान है या अभिशाप हमें इनके कारणों को जानना आवश्यक है।

मेरे अनुभव व ज्ञान के अनुसार गुस्सा या क्रोध के पीछे निम्नलिखित कारणों में एक अवश्य छिपा होता है। आप स्वयं भ इसका अनुभव कर सकते हैं आइये इन कारणों का विश्लेषण करते हैं।

कामना -इच्छा

प्रथम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण है कि किसी वस्तु, धन, संपत्ति, पद स्त्री पुरुष के मिलन, किसी के मान मर्दन  विनाश की कामना का अत्यधिक वेग से हृदय में होना और उसको पूर्ण करने में या प्राप्त करने में व्यवधान उत्पन्न होने पर हमारे अंदर क्रोध की अग्नि प्रज्जवलित हो जाती है और हर उस व्यक्ति की परिस्थिति या कारण पैदा करने वाले पर क्रोध उत्पन्न हो जाता है जितनी बलवति कामना या इच्छा उतना ही अधिक क्रोध।

अपमान-
किसी भी कारण से यदि व्यक्तिगत या सामाजिक प्रडताडना अपमान होना या उसकी संभावना हमारे अंदर क्रोध व गुस्से को धधकते अंगारों में परिवर्तित कर देता है। अपमान का कारण कुछ भी हो चाहे हमारी गलती भी हो फिर भी उसकी ग्लानि हमें क्रोध व प्रतिशाध की भावना से भर देती है और बुद्धि व तार्किकता को अपने अधिकार में कर लेती है।

अभिमान-

किसी कुपात्र को किसी कारण से यदि सुंदरता, यौवन पद प्रतिष्ठा, संपत्ति, बल इत्यादि में एक भी या अधिक प्राप्त हो जाये तो सामान्यतः उसका विवके नष्ट हो जाता है और वह अपने आदेश पक्ष को ही महत्व देना आरंभ कर देता है और यहाॅं तक तार्किक लक्ष्यों को भी अनदेखा कर देता है और यदि कोई उसके अभिमान भावना को ठेस पहुंचाये तो वह क्रोध व गुस्से की प्रतिमूर्ति बन जाता है।

मूर्खता-

यदि किसी व्यक्ति का विवके नष्ट हो जाये शारिरिक और मानसिक शक्तियों को संतुलन कम हो जाये तो उसको अपनी प्रत्येक बात सही लगने लगती है और वो उसका विरोध करने वालों के प्रति क्रोध व प्रतिशोध की भावना से ग्रसित हो जाता है
अवहेलना-
जीवन मे कई बार विपरीत स्थितियाॅं भी आ जाती है। कई बार आर्थिक, शारीरिक स्थिति सामाजिक स्थिति में या कोई कुकत्र्य के कारण व्यक्ति को सामाजिक अवहेलना झेलनी पड़ती है और वो अपने से सशक्त व्यक्तियों से तो प्रतिशाध ले नही पाता  परंतु उसमे क्रोध व गुस्सा अंर्तमन मंे बढ़ता जाता है। और वो कभी भी किसी अपने से कमजोर पर फट जाता है या फिर छिपकर प्रतिशोध लेने कली प्रकृति में कुछ भी अनिष्ट कर सकता है।

प्र्रेम की असफलता –

प्रत्येक प्राणी की हार्दिक इच्छा होती है कि वह किसी का प्रेमपात्र हो परंतु यह कामना लगभग अपूर्ण रहती है इसका वेग बढ़ता रहता है और यदि किसी का प्रेमपात्र उसके प्रेम को ठुकरा दे या किसी अन्य से प्रेम आरंभ कर दें या कोई प्रेमपात्र को अपमानित कर दे तो क्रोध का आवेग उच्चतम स्तर पर हो जाता है और बुद्धि पर प्रतिशाध का आधिपत्य हो जाता है। अधिकतर प्रेम की असफलता ही मुख्य कारण है।

विफलता-
कई बार ऐसा होता है कि हम अपने सामथ्र्यानुसार पूर्ण मेहनत करते हैं प्रयास करते हैं परंतु जब देखते है कि हमारे से कम सक्षम व्यक्ति पैसे पद या सामथ्र्य का दुरुपयोग कर हमारी विफलता का कारण बन जाता है तो हमें व्यवस्था, संस्था पर क्रोध पर क्रोध आता है जो निराशा में बदल जाता है। और व्यक्ति आत्महत्या या हत्या जैसे अपराध क्रोध के आवेश में कर लेता है।

अति-विश्वास-  सामान्यतः विश्वास होना एक गुण है। परंतु कई बार अपने पर या अपनों पर अति विश्वास हो जाता है और ज बवह किसी कारण टूट जाता है तो वह उसको जिसने हमारे आत्मविश्वास को ठेस पहुंचाई या तोड़ा क्रोध का पात्र बना देती है और परिणाम स्वरुप बहुत जाते हैं। हम उन्हें हर हाल में टूटते बिखरते, गिड़गिड़ाते देखना चाहते हैं।

तुच्छता-

परिस्थिति व्यक्ति को कई बार ऐसी स्थिति मे ला देती है कि व्यक्ति समाज में आर्थिक सामाजिक, व्यक्तित्व के मामले में निम्नतर स्तर पर पहुंच जाता है तो उसके हृदय में पहले तुच्छता का भाव अधिकार कर लेता है फिर ग्लानि के मार्ग से वह उस व्यक्ति परिस्थितियों के प्रति क्रोध व गुस्से मे भर जाता है जो घातक कारक है या मजाक कटाक्ष करें क्योंकि उसके पास खोने को कुछ नहीं होता और प्रतिशोध ही जीवन का उदेश्य हो जाता है।

आवेश- यह भी संभव है कि कुछ व्यक्तियों में जैनेटिक कभीहोती है या स्वास्थ्य संबंधी कमियों के कारण ब्लड प्रेशर, शुगर आदि भी बिना किसी कारण या उकसावे के अनभिज्ञता वश व्यक्ति गुस्सा करता है औरों से  ज्यादा अनर्थ करता है। यह क्रोध, गुस्सा एक अनचाहा कारण बन जाता है। यह प्रकृति विशेषतौर पर संबंध व्यक्तियों में अधिकार प्राप्त व्यक्तियों में कार्य बढ़ रहा है।

एकांकीपन-
अंत में और एक विशेष कारण है कि किसी भी कारण से यदि कोई व्यक्ति अपने से दूर लम्बे समय से एकाकीपन में जीने के लिये बाध्य हो तो धीरे-धीरे या तो वो अवसाद ग्रसित हो जाता है अथवा उसके मन मंे व्यक्तियों समाज व व्यवस्थाओं के विरुद्ध क्रोध का भाव पैदा होता है और वह उसके आवेश मंे अपना या किसी अन्य का कोई भी अनिष्ट करने पर उतारु हो जाता है।

निराकरण- हम आरंभ में ही गुस्से और क्रोध का अंतर स्पष्ट कर चुके हैं अतः यह तो सत्य है कि क्रोध हमारी एक नैसर्गिक संवेदना है और उसका प्रयोग विवके के साथ कारने का विधान शास्त्रों में भी है और जीवन में कुछ परिस्थितियों में आवश्यक भी है और करना भी चाहिये। परंतु गुस्सा जिसका उपयोग अधिकांश स्वार्थपूर्ति अहम् की संतुष्टि बल के प्रदर्शन आघिपत्य हेतु या किसी भी प्रयोजन से हो वह त्याज्य है। लक्ष्य विहीन गुस्सा हमारे लिये अत्यंत हानिकारक है और इसका सतत् प्रयोग व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व संपत्ति सुख शांति से वंचित कर देता है। गुस्से का अंत पश्चाताप पर होता है और इसके हवन में संबंधों मित्रों व प्रियजनो ंकी आहुति हो जाती है अतः गुस्से पर नियंत्रण रखना हमारी व्यक्तिगत एवं सामाजिक दायित्व है। इसके लिये कोई भी एक सर्वसम्मत मार्ग नही है परंतु निम्नलिखित कुछ प्रयास हमें अवश्य इसे शांत करने में सहायक होगें।

आत्मचिंतन व ज्ञान-

हमें जीवन में सतत् आत्मचिंतन करना चाहिये। हमें अपनी विशेषताओ और कमियों का अहसास होना चाहिये। हमें बिना कारण पता किये बिना किसी भी परिस्थिति में क्रोध या गुस्सा नहीं करना चाहिये कुछ क्षणों तक मनन करना चाहिये कि सामने वाले पर हमें क्यों गुस्सा आ रहा है कहीं हमें कोई गलतफहमी अथवा मिथ्या या अर्द्ध सत्य-तथ्य तो पता नहीं अपने को सामने वाले के स्थान पर रखकर सोचें गुस्सा या क्रोध एकाएक नहीं करना चाहिए हो सके तो क्रोध व गुस्से को कुछ समय या दिन के लिये स्थगित करें। यदि हम मनन कर पाये ंतो लगभग आधी परिस्थितियों में, आवेगों मंे और उत्तेजना जनित केसों में कमी जायेगी या हम अकारण क्रोध व गुस्से से बचने में सक्षम होंगे।

संतोष व सामंजस्य-

प्रत्येक मानव को ईश्वर ने विभिन्न वरदानों से नवाजा है और हरेक में कुछ विशेषतायें औरों से अधिक होती है और कुछ कमियाॅं भ्ज्ञी होती है हमें उनमें सामंजस्य रखना आना चाहिये। हमें जो भी ईश्वर ने प्रदान किया है उसमे संतोष कर भविष्य में उन्नति के लिये प्रयास करना चाहिये। अपने गुणों और विशेषताओं पर गर्व मानकर और कमियों को दूर करें। किसी पर क्रोध करने से वह कमी पूरी नहीं होगी। संतोष जितना हो आवश्यक है परिस्थितियों पर नियंत्रण कर व विपरीत परिस्थिति में सामंजस्य कायम रखना। इस और प्रयास करें। जीवन मंगलमय होगा शांत होगा और अधिक सुखमय होगा।

कामनाओं पर अंकुश अधिक आवश्यक है मन कामनाओं का भंडार है एक पूरी होते ही दूसरी जन्म ले लेती है कामनायें हमारे जन्म के साथ ही उत्पन्न होती है। कामनायें जहाॅं हमें कर्म करने, उन्नति करने, मेहनत करने को प्रेरित करती है वही अप्राप्य व अनियंत्रित कामनायें हमें अपराध झूठ व असंतोष के वातावरण मे धकेल कर जीवन से सुख व आनंद को छीन लेती है। अतः कामनाओं पर मनन करें, अपनी शक्ति साधनों व सामथ्र्य के अंतर्गत हो उनके प्राप्ति के प्रयास करें परंतु कामना रुपी घोड़े को लगाम बुद्धि रुपी चालक के हाथ में ही रखें।
गुस्से का एक कारण हमारी मानसिकता व स्वास्थ्य भी है और इसमें हमारा आहार, विहार का उचित होना आवश्यक है हमें किसी प्रकार के व्यसन यथा शराब, चरस, गांजा आदि नशीले पदार्थो का सेवन नही करना चाहिए ना ही बहुत तेज मसाले प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन करना चाहिये। सादा जीवन उच्च विचार को आदर्श मानना, अपनाना चाहिये। नशा व अभिष्ट भोजन क्रोध व गुस्से की जननी व पोषक है।

आत्मविश्वास
आत्मविश्वास हमारे जीन को सुखमय शांतिमय समृद्ध बनाने का मुख्य कारक है अपने पर विश्वास रखें अपने सामथ्र्य पर विश्वास करके, अपनी कमजोरियों का ज्ञान रखें और दूसरों के प्रति विश्वास रखें। यदि कोई क्रोध का कारण बनता है तो विश्वास रखें कि हम उसका उचित उत्तर देने मे सक्षम है परंतु पहले से शंकित न हो। उपयुक्त समय की प्रतिक्षा करें ना कि गुस्सा।

क्षमा व प्रतिशोध का त्याग-
क्हते है क्षमा वीर का आभूषण है यदि किसी ने कोई गलती कर दी तो एकाएक क्रोध न करें, न ही तूल दें, यदि किसी अपनी त्रुटि का आभास हो तो क्षमा कर दें और उसके भविष्य में व्यवहार पर नजर रखें। क्षमा से भी आवश्यक है कि प्रतिशोध का त्याग। ईश्वर न्यास पर विश्वास रखें। प्रतिशोध अग्नि से अग्नि बुझाने के समान है अपनी शक्ति का उपयोग अपने अच्छे कार्यो और व्यवहार से दूसरों को हराने में करें।
प्रतिशोध आत्मिक प्रगति, सामाजिक प्रतिष्ठा के पांव में बंधी जंजीर है जो दूसरों के बजाय पहनने वाले को ज्यादा कष्ट देती है।

ईश्वर आस्था- हमें सदैव ध्यान रखना चाहिये कि ईश्वर ने हमें जिस उदेदश्य के लिये पृथ्वी पर जन्म दिया है और उस कार्य को पूरा करने के लिए कुछ विशेषताएं प्रदान की है। अतः कोई हमें तुच्छ समझे जाने अनजाने अपमान करें, निराशा छा जाये दिवाला आ जाये या कोई उकसाये। ईश्वर से प्रार्थना करो कि हमको शक्ति दे जिससे हम अपने अस्तित्व को उनसे बड़ा सिद्ध करें। समय प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य जवाब देता है धैर्य बनाये रखें। ईश्वर पर अड़िग आस्था रखें वो भगवान कृष्ण बन तुम्हारे जीवन रथ को सही दिशा देगें और विरोधियों को समुचित उत्तर।

उपरोक्त वर्णन उपायों से गुस्से पर नियंत्रण पाया जा सकता है और जीवन की उर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाकर सुखमय, शक्तिमय गरिमामय जीवन व्यतीत किया जा सकता है।

क्रोध एक वरदान-

गुस्सा प्रत्येक परिस्थिति में दुखमय व हानिकारक है परंतु क्रोध के साथ ऐसा नही है यदि हम का्रेध को सकारात्मक उपयोग करते हे तो यह एक वरदान है क्योंकि यह एक सनातन संवेदना है प्रत्येक प्राणी में। अतः यह आवश्यक है कि हमें उन परिस्थितियों का ज्ञान व आभास आवश्यक होना चाहिये जहाॅ यह वरदान है
क. आत्मरक्षक परिजन के जीवन को खतरा होने पर का्रेध स्वीकार्य है यदि हम क्रोध नहीं करते हो सकता है कि हम अपने परिजन को खो दें। जान की रक्षा के अतिरिक्त यदि स्वयं या परिवार के मान सम्मान का प्रश्न हो यथा किसी परिवार की महिला का सार्वजनिक अपमान के हेतु क्रोध उचित है।

ख. देश की रक्षा में यदि आक्रामक का अतिक्रमण हो या अपमान होत ो का्रेध करना उचित है।
ग. किसी भी शरणागत की रक्षा किसी असहाय को प्रताड़ित करने वाले दुर्जन पर क्रोध और शक्ति प्रदर्शन उचित है।

घ. किसी महिला को बचाने में, अशक्त व बुजुर्ग पर अत्याचार करने वाले दुर्जन पर।
ड़.  अपनी संपदा धन संपदा के हरण करने वाले दुर्जन पर क्रोध आवश्यक न्यायोचित है।
च. बार-बार अपमानित करने वाले दुराचारी से आत्म रक्षार्थ।

छ. धर्म-परम्पराओं व धर्म स्थलों को क्षति कर्ता व अपमानित करने वाले व्यक्ति या समूह के प्रति क्रोध का प्रदर्शन आवश्यक है।
अतः चाहे उपरोक्त परिस्थितियों में क्रोध आवश्यक व उचित है परंतु प्रत्येक परिस्थिति में बुद्धि संयम आवश्यक है। और क्रोध एक सीमा पर करना चाहिये उसका उपभोग अपवाद स्वरुप करना चाहिये। और उसका उदेश्य क्रोध के पात्र को समझाना उचित मार्ग पर ले जाना और सुधार करना चाहिये।

आशा है कि भविष्य में आप यदि गुस्से क्रोध के कारण व निवारण में आप यदि गुस्से क्रोध के कारण व निवारण पर तनिक भी ध्यान देंगे तो आपका जीवन ईश्वर की कृपा से शांतिमय, प्रेममय व समृद्ध व्यतीत होगा।

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